वह मेरी कक्षा में सबसे पीछे वाली लाईन में बैठता था, बिल्कुल दूसरे दरवाज़े के पास, पहला दरवाजा वह था जिससे शिक्षक महोदय एंव प्रथम अथवा द्वितीय पंक्ति के मेधावी
छात्र आते जाते, दूसरे दरवाजे को फ़िसड्डी, उत्पातियों, खिलंदडी और खेल कूद करने वालों ने जैसे खुद
ही अपने लिये आरक्षित कर लिया हो. गुलफ़ाम की जगह पिछले दरवाज़े
के ठीक सामने वाली लाईन थी, दरी पर वह अक्सर कमर-सिर झुकाये बैठता. कमर को मोड़ कर बैठने की एक वजह यह
भी थी कि वह उम्र में अपने सहपाठियों से कुछ बडा था और कद में लंबा भी. शिक्षक की उस पर खास तवज्जो न हो इस लिये ४०-५० छात्रों
से भरे कमरे में वह अपने आप को अन्य छात्रों के साईज़ के जैसा बना लेता. उसका मन पढाई में कतई नहीं लगता. रेसिस के दौरान अक्सर
स्कूल के मैदान में उसके मौहल्ले के आवारा, उम्र रसीदा लड़के
उसका इंतज़ार करते. वह उनके साथ खुश रहता और छुप-छुप कर बीडी सिरगेट फ़ूंकता. गुलफ़ाम का रंग बेहद काला
था. हंसता तो बस उसके पीले- पीले दांत भी
सफ़ेद लगते, बाल भी वह हीरो स्टाईल में लंबे लंबे रखता,
जब वह साईकिल चलाता तब लगता जैसे उसके अंदर मुकद्दर के सिकंदर के अमिताभ
बच्चन की आत्मा का प्रवेश हो गया हो. बारहाल उसके बाल कानों के
पीछे-गुद्दी के नीचे तक जो गोल-गोल घूमते
थे वे हवा में उड़ते तो उसके आनंद की अनुभूति उसे देखने वाले को भी महसूस होती.
अपनी विशेष हरकतों के चलते लगभग हर शिक्षक गुलफ़ाम को पहचानता, उसे यह भी पता होता कि स्कूल में दिया गया काम
अगर किसी छात्र ने नहीं किया तो गुलफ़ाम का नाम उसमें सबसे पहले होता, लिहाजा उसकी पिटाई हर रोज़ की मुकर्रर रस्म होती. शिक्षकों
के हाथ की खाज मिटाने में गुलफ़ाम माहिर था कभी-कभी तो शिक्षक
उसे आदतन ही एक दो लगा देते जिसे गुलफ़ाम शिक्षक का प्रसाद समझ कर सहर्ष स्वीकर कर लेता.
उस दिन रोज़ की तरह अहले सुबह गुलफ़ाम स्कूल जाने से पहले
नहाने के लिये गुसलखाने में घुसा था जब उसे औसत से अधिक समय लगा तो उसके अब्बा ने आवाज़
लगायी और वक्त से आगाह कराया. जब उन्हें गुसलखाने से गुलफ़ाम की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तब उन्होंने अजीबोगरीब
मंज़र देखा..गुलफ़ाम कच्छा पहने हवा में उछल-उछल कर कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा था. नल के नीचे बाल्टी
खाली रखी थी. गुलफ़ाम के अब्बा ने उसकी मां को बुला कर बाल्टी
भरने को कहा और गुलफ़ाम के बाल पकड़कर गुसलखाने से बाहर खींच लाये, कुछ ही देर में उनके हाथ में आयी कमची फ़टाफ़ट गुलफ़ाम की नंगी कमर पर बिजली की
तरह बरसने लगी. गुलफ़ाम शोर मचाता तो कभी बचने की कोशिश करता.
गुलफ़ाम की मरम्मत करने के बाद पानी की भरी बाल्टी उस पर उंडेली गयी तब
कहीं जा कर उसे होश आया...
उस दिन उसे स्कूल पहुंचने में भी विलंब हुआ जिसका स्वागत
पी टी आई साहब ने स्कूल के मेन गेट पर ही उसकी पिछाडी पर दो बैंत मार कर किया. उन दिन स्कूल में गुलफ़ाम बिल्कुल सुन्न रहा,
न कोई छेड़ छाड़, न खिलंदडी. जाने क्यों उसे मुझ से और मुझे उससे रगबत थी कि वह मुझे अपनी वो बातें भी बता
देता जो किसी को न बताता. छुट्टी के बाद घर जाते जब मैंने उससे
पूछा कि माजरा क्या है? उसने जवाब नही दिया फ़िर दोबारा पूछने
पर वह दो कदम तेज़ी से आगे बढा और अपनी कमीज़ ऊपर कर के मुझे कमर दिखा दी. एक ही झलक में मैंने उसकी कमर पर पड़ी लाधों को सिहरते हुए कायदे से देख लिया,
इससे पहले की मैं उससे आगे कुछ पूछता, गुलफ़ाम के
कदमों की रफ़्तार तेज़ हो गयी और हम दोनों के बीच फ़ासला बढ़ता गया. मैं समझ गया कि अब वह बात नहीं करना चाहता. उसके और मेरे
दरम्यां फ़ासला जितना बढ़ता गया उतनी ही मेरी उत्सुकता और गहराती गयी. उस दिन के बाद गुलफ़ाम स्कूल नहीं आया. उसके वालिद ने
उसका नाम स्कूल से कटा कर किसी खराद मशीन पर काम सीखने के लिये उसे लगा दिया था.
कस्बे से गुजरते हुये एक दिन अचानक मेरे बराबर में तेज़ी
से एक साईकिल सवार आकर रुका, मैंने चौंकते हुए उस शख़्स को देखा तो फ़ौरन पहचान गया, मुस्कुराता चेहरा, चमकते काले दाँत, पहले से लंबे झूलते बाल, गुलफ़ाम साईकिल से उतर कर मेरे
साथ पैदल चलने लगा, कुछ इधर उधर की तो कुछ जिंदगी की मसरुफ़ियात
पर बातें हुई..उसकी शादी हो चुकी थी. मौहल्ले
में ही उसने अपने घर के पास परचून की दुकान खोल ली थी. उसका अमिताभ
बच्चन स्टाईल और गहरा हो चला था जो उसकी बैल
बाटम से साफ़ झलकता था.
अचानक मेरे ज़हन में वह अनुत्तरित प्रश्न कौंध गया, स्कूल से लौटते हुए लाधे उखडी हुई उसकी कमर
मेरी आँखों के सामने आ गयी. मेरी उत्सुकता भरे प्रश्न का गुलफ़ाम
ने बहुत सहजता से उत्तर दिया. उसने बताया कि उस दिन से पहले वाली
रात को उसके मवाली दोस्तों ने उसे भरी हुई सिगरेट पिला दी थी, सुबह तक उसका नशा नहीं उतरा था. जब वह नहाने के लिये
गुसलखाने में घुसा तो नल और उसकी हत्थी हवा में उडती नज़र आ रही थी. वह नल की हत्थी उछल-उछल कर पकड़ने की कोशिश करता और वह
हाथ ही न आती. इस नज़ारे को अब्बा ने देखा तो वह ताव खा गये और
उसकी घुनाई कर दी फ़िर स्कूल से नाम कटा दिया..बस इतनी सी बात
थी.
स्कैच सौजन्य: गूगल
गुलफ़ाम की ऐसी न जाने कितनी हरकतों के चलते उसका नाम अब टोलम
पड़ चुका था, गुलफ़ाम के नाम से उसे मेरे जैसे पुराने लोग ही जानते. अब उसे बस टोलम के नाम से पूरा कस्बा जानता. टोलम को
जैसे कुछ अचानक याद आया हो, मुझे सलाम करता हुआ फ़िर मिलने का
वायदा करते हुए तेज़ी से वह साईकिल पर चढा और मेरी नज़रों से ओझल हो गया. उसके अमिताभ कट बाल हवा में लहराते हुए वह सब ब्यान करते जिसे वह न कभी बोल
पाया, न कभी किसी को समझा पाया.

टोलम ........... अच्छा स्केच खींचा आपने ! शुक्रिया !
ReplyDeleteबहुत दिलचस्प व्यक्ति-चित्र खींचा है आपने. अंत तक पहुंचते-पहुंचते लगता है यह जल्दी ही खत्म होगया, कि इसे तो और आगे जाना था. अच्छी किस्सागोई से दिन की शुरुआत करवाने के लिए बधाई, और आभार.
ReplyDeleteShamshad bahi… Think you very much for sharing yor childhood. I think I know TOLAM. He used to stay near Priya Talkies.
ReplyDeleteyes, you got it Rizwan..:)
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