Sunday, June 3, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से-भाग ४- करीम


 

उसके चेहरा हमेशा भाव शून्य रहता, बिल्कुल स्थिर मानो प्रकृति ने उसे किसी खास ढाँचे में ढाल कर भेजा हो. किसी के यहाँ गम हो तब, किसी के यहाँ खुशी हो तब, कोई मरे, कोई जिये उसे किसी बात से कुछ फ़र्क न पड़ता था. एक गंदा पीला लंबा सा कुर्ता, सफ़ेद रंग का मैला सा पाजामा और पाँव में अधमरी सी चप्पलें. उसके सिर के अधिकतर बाल उड़ चुके थे सो लंबे-छोटे का अहसास ही नहीं होता था. जो सिर का हाल था वही ढुड्डी का. गोरा सा रंग, चमडी पर मैल चढा साफ़ दिखायी पडता, दरम्याना कद छोटी-छोटी गोल-गोल आँखें उसकी तसदीक किसी इंसान के रुप में करने को काफ़ी थी.

वह मुझे कस्बे से गुजरते अक्सर मिलता, बहुत से लोगों को आप बस चेहरे से जानते है और उनसे कोई बाजाप्ता तार्रुफ़ भी नहीं होता फ़िर भी जहन की एड्रेस बुक में ऐसे कई नाम दर्ज रहते. मेरा इस तरह का एक तरफ़ा परिचय बहुत से लोगों के साथ है. जिनसे कभी दुआ हुई न सलाम, लेकिन उनकी उपस्थिती मेरे जहन में रकम है. ऐसा ही एक किरदार है यह करीम, जिसके पीछे कभी-कभी छोटे शैतान बच्चे लग जाते और उसे बस यूँ दौडा लिया करते. कभी सब्ज़ी मण्डी के मुहाने पर तो कभी इस्लामिया मदरसे वाली शहर की व्यस्त सड़क पर उसके साथ हर रोज़ कोई न कोई मजमा, कोई भी लगा लेता था. कभी सद्दीक पनवाडी उसे आवाज़ लगा कर छेड़ लेता तो कभी रमजानी बिसाती तो कभी फ़रीद गुड़ वाला. बारहाल कोई भी डोर इतनी नहीं खिंचता की टूट जाये इसका इलाज उन्होंने निकाल लिया था, ये सभी हरकत करने वाले लोग करीम को छेड-छाड़ने के बाद उसे एक बीड़ी दे देते. एक शायद यही आसक्ति करीम में थी. बस वह बीडी बडे शौक से पीता. मुझे यूँ ही लगता जैसे करीम दुनिया में सिर्फ़ बीड़ी पीने ही आया है. बीडी ही करीम और उसे छेड़ने वालों के बीच एक अघोषित करार था जो दोनों पक्षों को मंजूर था और दोनों ही फ़रीक़ इसका पूरा एहतराम भी करते.

करीम की एक सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उसका दाहिना हाथ ठीक उसकी ठुड्डी के समानांतर हमेशा सीधा हवा में तना रहता. वह इसी स्थिती में पूरे कस्बे की गश्त किया करता. इस अजीब पहचान के चलते वह अपनी तरह का एक वाहिद इंसान पूरे कस्बे में था. अब इस पहचान को लोग अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसका नाम रख देते...पर करीम पर इस बात का कतई फ़र्क न पड़ता कि कोई उसे नेता जी कहे या अंबेडकर. मुझे यकीन है कि करीम का नाम कस्बे के हर मौहल्ले में जरुर अलग-अलग रहा होगा, जिसे लोगों ने अपनी सुविधानुसार रख दिया होगा. करीम के जहन में किसी भी मौहल्ले से कोई परहेज था ही नहीं, वह घड़ल्ले से पूरे कस्बे की तमाम जातियों, धर्मों की बस्तियों में बीडी का धुँआ उड़ाते, अपना ट्रेड मार्क हाथ ठुड्डी की सिधाई में रख कर गश्त करता. उसे हर बस्ती में बीडी देने वाले भी थे और छेड़ने वाले भी. कभी जब हवा का रुख उल्टा होता, फ़िज़ा में नफ़रत या कोई दहशत बरपा होती तब करीम को उसके मौहल्ले के लोग दूसरे गैर मुस्लिम इलाकों में न जाने देते, उसे ड़राते लेकिन उसे कौन समझा सकता था? उसे वही करना होता जो उसके मन में होता.

उस दिन थोडी सर्दी सी थी, इत्तेफ़ाक से करीम मेरे आगे-आगे था और मैं उसके पीछे-पीछे, उसका किधर का रुख था कौन जाने पर मुझे अपना जरुर पता था. करीम के सिर पर मफ़लर बंधा था और उसके बदन पर एक पुरानी लोई पांव में मोजे और प्लास्टिक की चप्पल, जिसकी जमीन पर घिसने की अपनी खास तरह की आवाज़ थी. सर्दियों की उस अलसाई घुंध वाली सुबह के सन्नाटे को थोडे-थोडे वक्फ़े पर यह आवाज़ भद्दे तरीके से तोडती थी. करीम से आगे कोई २० गज की दूरी पर यासीन अपने घर से निकला. जेब टटोल कर बीडी अपने मुँह मे लगा कर जब तक सुलगाता और अभी पहला कश मारने ही वाला था कि करीम का हमेशा सीधा रहने वाला हाथ उसके मुँह तक पहुँच गया था, जैसे ही करीम ने यासीन को चलते हुए पास किया तभी यासीन के मुँह में ताजी ताजी सुलगी बीडी करीम की उँगलियों में फ़ँस चुकी थी. करीम के सीधे हुए हाथ की उँगलियों ने मछली पकड़ने के काँटे जैसा काम किया और तुरंत उसके दूसरे हाथ में बिजली सी हरकत हुई, दाहिने हाथ में फ़ँसा शिकार अब उसके मुँह में जा चुका था और करीम गहरे कश मारता हुआ आगे बढ़ गया.

यासीन अचानक हुई इस लूट से सकपकाया, इस सदमें से संभलते हुए उसे कुछ क्षण अवश्य लगे. इससे पहले कि वह कुछ करता उसके घर के इर्द-गिर्द खड़े जिसने भी इस लाईव कामेडी सीन को देखा, वे पागलों की तरह जोर-जोर से हंसने लगे...यासीन करीम को बहुत देर तक मां-बहन की गाली देता रहा..वो जितना गाली-गुप्पड़ वह करता हँसने वालों की आवाज़ें और बढ़ जाती..करीम ने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वह बस चलता ही गया...बेखबर धुँआ उड़ाते हुए.

रचनाकाल: जून २,२०१२

चित्र सौजन्य: गूगल

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