सर्दियों में कस्बे की गुड़ मण्डी के चौपले से सटे रास्ते पर उसका ठिकाना था. फ़ड लगाने वाले वहां अपना सामान बेचते, कोई फ़ल बेचता तो
कोई सब्जी. देहात से आने-जाने वाले काश्तकारों के लिये यह बडे
मौके का अड्डा था. पास ही चक्की के दो बड़े-बड़े पत्थर वहाँ पड़े-पड़े स्थायित्व ग्रहण
कर चुके थे जिनपर मंगलू अक्सर दोपहर के समय तब बैठ जाता जब राहगीरों का आना-जाना कम हो जाता.
मूँगफ़ली का थैला देख कर नज़दीक से गुजर रहे एक चौधरी ने मंगलू से पूछा-
"अले ता भाव दी मूँउफ़ली? भाव पूछने के साथ ही चौधरी का
एक हाथ मंगलू की पोटली के मुहाने तक पहुँच चुका था. मंगलू ने
प्रश्न का उत्तर देने का इंतज़ार किया कि चौधरी पहले एक मूँगफ़ली फ़ोड़ कर चख तो ले,
ताकि उसे पता चल जाये कि करारी हैं, बड़ी बड़ी हैं
और कायदे से भुनी हुई गर्मा गर्म भी हैं. पोट्ली के अंदर रखी
छोटी सी अंगीठी मूँगफ़लियों को गर्मा गर्म भी रखती थी.
"दो... दो लुपे पाव है, गस्ता
कलाली गलमा गलम" मंगलू ने हकलाते हुए जवाब दिया.
"अले तीक ताक लगा ले दिन धल ला"..चौधरी ने फ़ुर्ती
से मूँगफ़ली चबाते हुए कहा.
मंगलू ने चौधरी का जवाब इस बार ज़रा और गौर से सुना और अब उसकी त्यौरियाँ चढ़ चुकी थी.
इस बीच चौधरी का हाथ दूसरी बार उसकी पोटली में दाखिल हो चुका था, मुठ्ठी भरके चौधरी बोला, "अले पांच ती तिलो देत्ता
हो तो दे दे, अन्नी ताल तल"...
अब मंगलू का पारा सातवें आसमान पर था- "तल तल,
भाद यहाँ से.. आया बदा एक तिलो लेने वाला... पांच ति तिलो लेला". गुस्से के स्वर में उसने जवाब दिया. मंगलू का हाथ चौधरी की हथेली पर बची चार-पाँच
मूँगफ़ली वापस झपटने से न चूका.
मंगलू के इस अप्रत्याशित व्यवहार को देखकर चौधरी भी भक्क रह गया, थोडी देर दोनों में तू-तू मैं-मैं हुई, इस बीच मंगलू अपनी पोटली पत्थर पर रख चुका था और उसकी तराजू चौधरी की खोपडी
पर एक दो बार दस्तक दे चुकी थी. चौधरी एक हाथ से सिर को बचाये
तो दूसरे हाथ में उसकी जूती जवाबी वार करने के लिये रस्ता ढूँढे.
दोनों की इस हड़बौंग को देख आसपास के राहगीर रुक गये, मण्डी में काम करने वाले पल्लेदार भागे आये और दोनों लड़ाकुओं को एक दूसरे से
अलग कर चलता करने का प्रयास करने लगे.
कुछ देर बाद जब मंगलू का पारा जरा नीचे उतरा तो एक पल्लेदार ने उससे पूछा कि हुआ
क्या था, ऐसा क्या कह दिया था चौधरी ने तुझे जो तू उसे
लिपट गया?
"इससी मां ती.....साल्ला मेली नतल उताल ला ता"... मंगलू
ने बड़ी सी गाली देते हुए कहा, "बोत माला मैंन्ने साले तू"....
पल्लेदार जोर से ठहाका मारते हुए बोला, "अबे बेवकूफ़
मैं उसे जानता हूँ, तिगरी गाँव का चौधरी है, अपना गल्ला लाला चमन को बेचता है और वो भी तोतला है तेरे जैसा, तेरी नकल नहीं उतार रहा था वो"..
मंगलू ने सलमान पल्लेदार की बात को गर्दन के झटके से नकारा और पोटली उठा कर तेज़ी
से अपने घर की तरफ़ बुदबुदाता हुआ चल दिया.
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रचनाकाल: मई १८,२०१२
