कस्बे की सबसे बडी और प्रसिद्ध धर्मशाला में अक्सर शादी ब्याह के अतिरिक्त सामाजिक काम भी होते, बस अड्डे के सामने होने के कारण उसका रणनीतिक महत्व भी था. कवि सम्मेलनों, मुशायरों के लिये इसका उपयोग खूब होता क्योंकि बाहर से आने वालों को आयोजन स्थल के लिये दूर चलना ही नहीं होता था, बस से उतरो और ठीक सड़क पार धर्मशाला.
सर्दियों की सुस्ताई हुई सी उस शाम को मास्टर सलीम की सदारत में मुशायरे का अयोजन किया जा रहा था, जिले भर से कई नामी गिरामी शायर बुलाये गये थे. कस्बे में मुनादी के साथ-साथ पर्चे भी बंटवा दिये गये थे ताकि अदब में रुचि रखने वाले लोग मुशायरे में पहुँचे और शायरों के कलाम से लुत्फ़ उठायें. धर्मशाला के आँगन में दरियाँ बिछा दी गयी थी. उसके आँगन को ऊपर से पंडाल लगा कर ढक दिया गया था ताकि ठंडी हवा दाखिल न हो. रोशनी के लिये जो हण्डे मंगवाये गये थे उनसे माहौल में गर्मी भी पैदा हो गयी थी. १५०-२०० श्रोताओं से धर्मशाला का आँगन खचाखच भर गया था. सामने बीचों बीच मंच बनाया गया था जिसपर १५-२० कदीमी और बाहर से आये शायर हज़रात गोल-गोल, मोटे-मोटे तकियों पर कमर लगाये आधे बैठे, आधे लेटे अपने-अपने नंबर का इंतज़ार कर रहे थे. सभी की सहूलियत के लिये उगालदान मंच पर ही मौजूद थे ताकि पान खाने वालों को कोई दिक्कत पेश न आये.
मुशायरे का पहला घंटा कदीमी नौजवान शायरों के आने-जाने में निकल चुका था. अब महफ़िल परवान चढ़ने लगी थी कि महबूब का हाथ पकडे ४-५ लडकों का एक समुह दाखिल हुआ किसी का लोई तो किसी ने खेस तो किसी ने मफ़लर से मुँह ढ़का हुआ था. अब सर्दी है तो किसी को कोई एतराज़ भी नहीं.
बारहाल आँगन में बैठने की जगह तो थी ही नहीं, मंच की बगल में जो बरामदा था वहीं कतार बद्ध थमों के इर्द-गिर्द ये चौकडी खडी हो गयी. बाहर के एक दो शायर अपना कलाम पढ़ चुके थे, वाह वाही के दौर से महफ़िल के जोश को समझा जा सकता था कि सदर मोहरत ने जिले के सबसे बडे शायर को दावत दी, खाँस खूँस कर गला साफ़ करते, उगालदान में थूक-थाक कर शायर महोदय ने अपना कलाम सुनाना शुरु किया. उन्हें सुनने के लिये पूरी महफ़िल दम साधे इंतज़ार जो कर रही थी. स्टार शायर ने मत्ला अर्ज़ किया, एक दो वाह वाह ने सन्नाटे को चीरा, नवाब ने महबूब के हाथ को दबाया और फ़ौरन एक रिहा खारिज़ करने की भयानक आवाज़ पैदा हुई, इस बेसुरे हादसे पर किसी की खास तवज्जो न हुई, शायर ने दूसरी लाईन पढ़कर शेर मुकम्मिल किया और महफ़िल की वाह-वाही लूटी.
शायर ने दूसरे शेर की पहली पंक्ति पढी, पहली और दूसरी पंक्ति पढने के अंतराल में एक दो वाह वाह के साथ महबूब की कलाई फ़िर दबी, इस बार पहले से भी अधिक भयानक आवाज़ थी. जिसे सुनकर श्रोताओं में से एक दो की हंसी छुट गयी, आँगन में बैठे लोगों की गरदनें आवाज़ वाली दिशा में मुड़ी और किसी बेज़ौक अपराधी को तलाशने लगी, शायर ने इस बार नोटिस लिया, जिस दिशा से आवाज़ आयी उधर इशारा करके कहा, "भाई अगर पेट खराब है तो बाहर चले जायें"..खैर उधर चेहरे ढके हुए थे, सदर की तरफ़ से आवाज आयी, इरशाद...शायर ने अपना शेर पूरा किया और जब दाद मिली तो स्टार शायर की साँस में साँस आयी.
अब तीसरे शेर का महफ़िल को बडी शिद्दत से इंतज़ार था. शायर ने अपने शेर की पहली पंक्ति पूरी की, कि बहुत सी निगाहें खुद ब खुद बारामदे की तरफ़ मुड़ गयी. अबकि बार महबूब की कलायी दबी भी नहीं, उसकी तरफ़ देखने वाली निगाहों का इसरार हुआ और फ़िर एक धमाकेदार आवाज़ आयी. अब शायर का सब्र टूट गया था. महफ़िल के सद्र मास्टर सलीम से मुख़ातिब होकर उन्होंने लानतें भेजना शुरु की और फ़िर गालियाँ बकनी शुरु कर दी. एक दो शायर भी खडे हो गये, बंद करो मुशायरा, इस बेगैरत माहौल में मुशायरे होते हैं? मास्टर सलीम शायरों की ढुड्डियों में हाथ डालने लगे. इसी बीच धक्का मुक्की में एक उगाल दान मंच से लुढ़का, उसकी पीक छ्लक कर नीचे बैठे किसी श्रोता के कपडों पर पडी जिसे देख कर किसी ने कहा खून..
बस फ़िर क्या, पूरी महफ़िल में जैसे भगदड़ मच गयी हो, सभी उठ-उठ कर भागने लगे..बाहर से आये शायरों ने आयोजकों को पकड़-पकड़ कर अपने पैसे मांगने शुरु किये, मास्टर सलीम की सफ़ेद जवाहर कट का हश्र थोडी ही देर में किसी पल्लेदार की जाकेट सा हो गया.
बाहर निकलती हुई भीड़ में वे चार-पाँच लडके महबूब के साथ जोर-जोर से हँसे जा रहे थे. जावेद, असलम, मुन्नव्वर फ़िल्म देखने जा रहे थे कि उन्हें महबूब दिखाई दे गया. शकील ने मश्विरा दिया क्यों न कस्बें में हो रहे मुशायरे में चला जाये. बस फ़िर क्या जावेद और महबूब की रास्ते में चलते चलते क्या सैटिंग हुई कि जावेद ने महबूब का हाथ थामे रखा.
इस घटना के बाद कई वर्षों तक कस्बें में कोई मुशायरा न हुआ. मास्टर सलीम की सप्ताहिक नशिस्तें जो उनकी बैठक में बिला नागा हुआ करती थी, वह पहले दरवाजों के पीछे होने लगी. जब वहां संभव न हो सकी तो स्थान बदली किया गया, जाने कैसे जावेद और उसकी मण्डली को खबर मिल जाती और वे बस अंदर आने की इज़ाज़त माँगते जो उन्हें न मिलती और नशिस्त भी आगे न चलती...
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रचनाकाल जून २७,२०१२
छाया चित्र सौजन्य: गूगल

बहुत मजेदार वाकया सुनाया आपने ,सोंच-सोंच कर खूब हंसी आई ! ऐसे खुराफाती लोग हर जगह मिल जाते हैं ! कुछ किस्से मेरे भी जेहन में कौंध गए ! बहुत बहुत शुक्रिया !
ReplyDeleteArun Sir, aisey bahut se kirdaar hamarey ird gird gash karte rahte hain....bus yun hi koi ek utha leta hun...
Delete:) बहुत मजेदार.
ReplyDeleteShukriya Manoj Bhai..
Deleteदास्तानगोई जिंदाबाद ...
ReplyDeleteसुबह सुबह पढ़ा भाई दिल हंस पड़ा....
Shukriya Bharat.....:)
Deleteशमशाद भाई यह वाकया पढकर बहुत मजा आया .../ आप ने इस वाकये का वर्णन भी बहित अच्छी तरीके से किया है ...तारीफ़ के काबिल ...
ReplyDeleteComrade Asrar, aapki tareef kisi Noble prize se kam nahi...shukriya.
Deleteवाह शम्स भाई... कितनी सजीव रचना है!..मज़ा आ गया...
ReplyDeleteShuab Bhai shukriya aapka...
Deletehah....
ReplyDeleteआप सभी मित्रों का मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि अपने कीमती वक्त में से मुझे इतने सारे लम्हे दिये...मेहरबानी.
ReplyDeleteमैं जब कभी बहुत उदास हो जाता हूं तो मैं शमशाद इलाही शम्स साहब की हंसोड श्रंखला का एक चरित्र चित्रण पढ़ लेता हूं ! मन हल्का हो जाता है ! मुझे ये चरित्र इसलिये भी सच्चे और अच्छे लगते हैं क्योंकि मैं भी उसी इलाके का हूं जिस इलाके के ये सब चरित्र हैं ! और लिखिए शम्स भाई !
ReplyDeleteHimanshu Bhai, main aapki mohabbat ka mashqoor hun...shukriya sathi.
DeleteShamshad bahi… brilliant
ReplyDeleteI can’t control my laughter.
Thanks Riz...!!!
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