Tuesday, February 17, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १६ - संघियों की पाद वार्ता


मेरे एक मेरठ के मित्र थे, १९८० के दशक के अंत में राम मंदिर आंदोलन चल रहा था, संघियों ने धार्मिक भावनाओं को चटपटे मसालों में लपेट कर घर घर पर दस्तक दी थी. एक ऐसी की किसी बैठक में शामिल होने का आमंत्रण उन्हें मौहल्ले पड़ौस के लोगों से मिला था, वह जिज्ञासु थे सो चले गए कि जाकर देखा तो जाए आखिर ये लोग करते क्या हैं?
इस खबर पर मेरी त्योरी चढ़ना लाजिम था और मैं भी जिज्ञासु था कि पूछ लूं आखिर मान्यवर क्या गुल खिला कर आये हैं?
अगले दिन जब वह कालिज आये तो मेरे जैसे उत्सुकगण मिल कर उनसे पूछने गए, कि कामरेड आपकी मीटिंग कैसी रही?
उन्होंने पान की पीक थूकते हुए सडा सा मुँह बनाकर जवाब दिया,"अरे वहां तो शहर के सारे लाला लोग इकठ्ठा थे, साले बात कम करते थे पाद ज्यादा मारते थे, मैं तो बीच में से ही उठ कर आ गया" 
उनके जवाब और अन्दांज़े ब्यानी को सुनकर हम सब जोर जोर हंसने लगे. उन दिनों घर- घर गली- गली पैदा की गई इस राजनीतिक विषाक्त वायु का राष्ट्रीय स्वरूप हम देश की संसद और उसके मुखिया तक स्पष्ट देख सकते है.
चित्र सौजन्य : गूगल 

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