Thursday, February 19, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १७ – बीज युद्ध


कनैडा में बहुत तरह के बीज खाए जाते है, कद्दू, सूर्यमुखी, तरबूज और न जाने क्या क्या, लेकिन खरबूजे के बीज नहीं मिलते जैसे भारत में उन्हें बड़े चाव से खाया जाता है. बीज खाना एक लत जैसा ही है कमबख्त जब तक आख़िरी बीज ख़त्म न हो चैन ही नहीं पड़ता.
गर्मियों की तपती दोपहर में खाना खाने के बाद जब बिजली गुल होती तब सभी भाई बहन और मम्मी के साथ बीज खाने का दौर चलता. बीच बीच में बिजली अगर आ जाती तो फिर कहने की क्या. टेबिल फैन  की घूमती हवा की गति से सामजस्य बैठा कर बीजों के छिलकों को बिना ज्यादा मुँह की हवा का प्रेशर लगाये दूर तक उड़ते देखना, उसका भी अपना ही आनंद था.
हम तीन बड़े भाइयों की इकलौती बहन (दो उससे छोटे भाई) भी साथ में बैठ कर खूब बीज खाती, बीज खाने से ज्यादा उनके छिलके गुडिया के मुँह पर मार कर सताने का अपना अलग ही लुत्फ़ था. शुरू शुरू में उसे लगा कि हवा के रुख से शायद बेसाख्ता ही वह छिलका उसके गाल पर आ कर चिपक गया हो, लेकिन जब बार बार कभी इधर तो कभी उधर थूक में भीगे गीले गीले छिलके उसके मुँह पर बरसने लगे तब वह समझ गयी कि ये खेल है क्या?
खैर वह भी स्यानी थी, सर पर दुप्पट्टा कायदे से बाँध कर, गालों को छिपाने का उसने इंतजाम कर लिया था, अब छिलके मारने वालों को अपने अपने निशाने की महारत दिखानी होती, दस मारो तब कही जाकर दो तीन चिपकते. छिलकों के मुँह पर चिपकने के बाद जो संग्राम होता वह भी देखने लायक मंज़र होता, कई बार माहौल इतना बिगड़ जाता कि गुस्से के बोझ में उसकी आवाज और बारीक पिचकी हुई सी हो जाती और वह सीधी बाउजी के पास जाकर शिकायत करती, फिर बाउजी चिल्लाते, जैसे उनकी जान गुडिया में अटकी हो. थोड़ी बहुत देर शांति रहती, बीजो के छिलकों की बरसात का रुख फर्श की तरफ होता तो कभी पलंग पर..लेकिन थोड़ी देर बाद छिलकों की फितरत ही थी कि उन्हें उड़ कर बिंदास अपनी मुक़र्रर जगह पर जाना ही होता. मम्मी जी इन हरकतों पर नज़र रखती, मना करती, डांटती तो कभी मारती लेकिन कौन सुनता और कौन मानता ?
कई बार हम लोग प्रोग्राम में चेंज कर देते, वह खामोशी से अपनी बीज खाती, हमने बैठने की जगह बदल ली उसके पीछे बैठ कर खाने लगते, गुडिया को लगता कि माहौल शांत है सो वो अपना दुपट्टा उतार कर खाने बैठ जाती, बस फिर क्या धीरे धीरे छिलकों का जमावड़ा उसकी पीठ पर फैले बालों पर जमने लगता तो कभी उसकी कमीज के पल्लू पर. जब वह उठती तो उसे पता चलता कि मामला क्या था. कई बार झुंझलाहट में उसने अपने नुकीले नाखूनों से मुझे नौच कर अपने गुस्से को शांत किया. उसके चांडाल रूप का सबसे ज्यादा शिकार बनते उससे छोटे दो भाई जिन्हें वो कस कर धोती, पिटने से बचने के लिए वो बड़े भाईयों की शरण में आते, उन्हें बचाने पर युद्ध और गति पकड़ लेता.

अब जब भी मैं यहाँ बीज खाता हूँ, अकेला या अपनी बीवी के साथ, छिलके हवा में नहीं उड़ते. अपने पसंदीदा सूर्यमुखी फूल के बीज खाता जरुर हूँ लेकिन हर बीज में उन खरबूजों के बीजों का रस ढूंढता हूँ जिनके साथ अपना बचपन गुजरा, गुजरा वक्त एक महाकाल के रूप में साक्षात मुझे लिपट जाता है, मैं खामोशी से अतीत के बीजों के साथ वर्तमान को आत्मसात करता हूँ.

Tuesday, February 17, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १६ - संघियों की पाद वार्ता


मेरे एक मेरठ के मित्र थे, १९८० के दशक के अंत में राम मंदिर आंदोलन चल रहा था, संघियों ने धार्मिक भावनाओं को चटपटे मसालों में लपेट कर घर घर पर दस्तक दी थी. एक ऐसी की किसी बैठक में शामिल होने का आमंत्रण उन्हें मौहल्ले पड़ौस के लोगों से मिला था, वह जिज्ञासु थे सो चले गए कि जाकर देखा तो जाए आखिर ये लोग करते क्या हैं?
इस खबर पर मेरी त्योरी चढ़ना लाजिम था और मैं भी जिज्ञासु था कि पूछ लूं आखिर मान्यवर क्या गुल खिला कर आये हैं?
अगले दिन जब वह कालिज आये तो मेरे जैसे उत्सुकगण मिल कर उनसे पूछने गए, कि कामरेड आपकी मीटिंग कैसी रही?
उन्होंने पान की पीक थूकते हुए सडा सा मुँह बनाकर जवाब दिया,"अरे वहां तो शहर के सारे लाला लोग इकठ्ठा थे, साले बात कम करते थे पाद ज्यादा मारते थे, मैं तो बीच में से ही उठ कर आ गया" 
उनके जवाब और अन्दांज़े ब्यानी को सुनकर हम सब जोर जोर हंसने लगे. उन दिनों घर- घर गली- गली पैदा की गई इस राजनीतिक विषाक्त वायु का राष्ट्रीय स्वरूप हम देश की संसद और उसके मुखिया तक स्पष्ट देख सकते है.
चित्र सौजन्य : गूगल 

Sunday, February 1, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १५ - दास्ताने वर्जिश


डाक्टर फैसल कस्बे के जाने माने रसूखदार खानदान से ताल्लुक रखते थे, होमियोपैथी की डाक्टरी पढ़ने के बाद अपने ही घर की दुकान में अपना क्लिनिक चलाने लगे थे. गोकि होम्योपैथी की दवा को जिन गोलियों में भिगो कर दिया जाता उस पर कस्बे की जनता को उन दिनों कोई ऐतमाद न था, कोई मछली के अंडो वाली तो कोई मकड़ी के अंडो वाली दावा बता कर अपनी जुबान साफ़ करता.
फैसल क्योंकि खानदानी थे इसलिए आम लोगों में उनका उठाना बैठना कम ही था, लेकिन क्लिनिक चलाने के लिए उन्होने अपने इस रिवायती बोझ को छोड़ कर कस्बे के पढ़े लिखे और पेशेवर लोगों से दुआ सलाम करने का सिलसिला चालू कर दिया था, इसी सोचे समझे मकसद के तहत उन्होंने अहले सुबह सैर पर जाना शुरू किया था. कस्बे के पुराने खेले खाए लोग उन्हें हर रोज सुबह सुबह दिखते, दुआ सलाम होती और साथ ही साथ वह अपने काम का जिक्र ऐसी तरकीब से करते कि दूसरे को बिना बताये यह पता चल जाता कि फैसल होम्योपैथी का बाजाप्ता पढ़ा लिखा डाक्टर है. अपने पेशे के प्रति जनता के अविश्विश्वास को तोड़ने में उन्हें काफी मशक्कतों का सामना था.
नई क्लिनिक की शुरुआत उन्होंने नए कपड़ों से की थी, दो शानदार सफारी सूट सिलवाये गए थे, एक हल्के आसमानी और दूसरा हल्के भूरे रंग का जिन्हें वह अदल बदल कर बड़े शौक और रौब से पहनते. सूट क्योंकि आधी आस्तीनों के थे तो देखने वाले को उनकी सेहत दूर से दिखाई दे जाती. उनके इकहरे बदन पर सफारी सूट यूं तो खूब जंचता लेकिन निगाह जब बाहों पर जाती तो देखने वाले की आँखे डाक्टर साहब को वह सब कुछ बता देती जिसे वह सुनना नहीं चाहते थे.
इक दिन सुबह सुबह जब डाक्टर फैसल सैर करके लौट रहे थे तब उनकी निगाह खैरात अली चौक पर नीम के पेड़ के पीछे छत पर दो तीन नौजवान लड़कों पर पडी जो अपनी रंग बिरंगी बनियानों में करसत कर रहे थे. उनकी निगाहें मिली तो चेहरे जाने पहचाने लगे, दुआ सलाम हुई. डाक्टर फैसल की उत्सुकता ने उनके कदम रोक लिए. जब वह खड़े हो गए तो छत पर खड़े लड़कों ने उन्हें ऊपर आने की दावत दे ही डाली. डाक्टर फैसल की जैसे मुँह माँगी मुराद ही पूरी हो गयी. आखिर ये सभी लडके कस्बे के एक नामचीन डाक्टर के खानदानी थे सो उनका एक पेशेवर रिश्ता तो था ही.
डाक्टर फैसल फुर्ती से जीना चढ़ कर उस कच्ची छत वाले कमरे पर पहुँच गए और वहां वर्जिश का सामान, डम्बल, वेट लिफ्टिंग बार, वेट, इनक्लाइनिंग, डी क्लाइनिंग बैंच, नान चाकू आदि साजो सामान देख कर उनकी आँखे खुली रह गयी.
अरशद भाई कितने बजे शुरू करते हैं आप ?
‘सुबह छ बजे डाक्टर साहब’, अरशद ने फ़ौरन जवाब दिया.
‘ओह आज तो लेट हो गया, क्लिनिक भी खोलना है मैं कल आता हूँ’. डाक्टर फैसल ने खुशी खुशी में फ़ौरन जवाब दिया और इज़ाजत ली, दुआ सलाम करके कल सुबह आने की बात तय हो गयी.
डाक्टर फैसल ने अगले दिन सैर पर जाने से बेहतर सीधे वही आने का निर्णय लिया. रात भर वह यह सोच सोच कर खुश होते रहे कि अब उनका शरीर भी सफारी सूट पहनने के लायक हो जायेगा, अब उनकी पतली पतली बाँहों में उन नौजवान लड़कों की तरह मछलियाँ दिखेंगी, अब उनका सीना पेट से बहार उभरा हुआ दिखेगा, अब उन्हें अपने मरीजों के सामने किसी अहसासे कमतरी का शिकार नहीं होना पड़ेगा.
खैर अगले दिन मुक़र्रर वक्त पर डाक्टर फैसल वर्जिश करने पहुँच गए. वहां पहले से ही तीन चार लडके अपने अपने काम में लगे थे. डाक्टर साहब ने आते ही सबसे पहले डम्बल पकड लिए और ...
‘अरे ये क्या कर रहे हो डाक्टर साहब, पहले वार्म अप कर लें’ अरशद ने उन्हें मशविरा दिया.
ओह हाँ, यू आर राईट’
उनके सामने लडके उस वक्त दंड पेल रहे थे.
ये कितने कितने मारते हैं? डाक्टर साहब ने लड़ाकों की तरफ इशारा करके पूछा.
ये तो कोई २०० मारता है कोई तीन सौ कोई पांच सौ.
आप आज पचास मार ले, पहला दिन है आपका.
हाँ, पचास ठीक है.
डाक्टर साहब दंड मरने के लिए जैसे ही तैयार हुए, अरशद ने फिर टोका.
‘डाक्टर साब, ये पहले हल्की स्ट्रेचिग वर्जिश कर चुके हैं, फिर बैठक मार चुके है अब ये दंड मार रहे है’.
ओह यस यू आर राईट. डाक्टर साहब ने धीरे धीरे उछलना कूदना शुरू किया थोड़ी देर बाद उन्होंने बैठके लगानी शुरू की, पूरी पचास बैठक मारते मारते पसीने की बूंदे उनके माथे पर चमकने लगी. पचास बैठकों के बाद थोडा सांस लिया, इधर उधर घूमे, फिर दंड पेलने शुरू किये. दस दस की किस्तों में उन्होंने पांच बार सांस लिया और पूरे  पचास दंड पेल दिए.
उसके बाद उन्होंने थोड़ी देर डम्बल घुमाए और फिर जम कर बैंच प्रेस लगाई. थोडा रुक रुक कर ही सही करीब एक घंटे तक डाक्टर फैसल अपने ख़्वाबों को हकीकत में तब्दील करने वाले काम को अंजाम देते रहे. उनका पसीना अब चमड़ी के सुराख खोलते हुए बाहर उनकी टी शर्ट पर साफ़ नक़्शे बना चुका था. उस दिन उन्हें लगा कि आज उन्होंने बहुत मेहनत की है. जीना उतरते हुए दीवार में बंधी रस्सियों पर उनके हाथ बेसाख्ता पहुँच गए. जैसे ही चौक पर पहुंचे तो उनकी निगाह मास्टर अकील पर पडी. अकील साहब भी उनके हम उम्र और कद काठी में डाक्टर फैसल के जुड़वाँ भाई से थे. दोनों की दुआ सलाम हुई, मास्टर अकील को पूछने की जरुरत नहीं हुई, डाक्टर फैसल के कपड़ो में पसीने ने सब कुछ खुद ब खुद कह दिया.
बहुत बढ़िया डाक्टर साहब, सैर वैर में कुछ नहीं रखा, मैं भी कल आपके साथ ही आता हूँ.
डाक्टर साहब ने मुस्कुरा कर रजामंदी दी और विदा हुए. आज उन्हें अपना वजन इतना बढ़ा हुआ लग रहा था कि उसे ढोने में टांगों को काफी मेहनत करनी पड़ रही थी.
अगले दिन सवा छः बज गए, सभी को डाक्टर फैसल का इंतज़ार था, कसरत करते करते एक लडके से जब रहा न गया तो दीवार पर टंगे घंटे को देखते हुए एक लडके ने अरशद से पूछ ही लिया
“चच्चा, डाक्टर साहब नहीं आये अब तक”
‘मुझे क्या पता, क्यूं नहीं आये, आयेंगे भी कि नहीं आयेंगे” अरशद के चेहरे पर जवाब के साथ एक कुटिल मुस्कान थी.
इससे पहले कि वह अगला सवाल करता जीने से किसी के आने की आवाज़ आयी, जिसे सुनकर अरशद ने मुँह पर ऊँगली रख कर खामोश रहने का इशारा किया. जूतों की आवाज़ नज़दीक होती गयी और सब की निगाहें दरवाज़े की तरफ लेकिन रिजल्ट देख कर मन ही मन सब चौक गए. मास्टर अकील को ट्रेक सूट में देखकर कर सबने स्वागत किया. लेकिन मास्टर अकील ने सबसे पहले प्रश्न किया, डाक्टर फैसल नहीं आये आज?
अरशद ने जवाब दिया, ‘आते होंगे, आप कैसे आ गए’ ?
आज से मुझे भी वर्जिश शुरू करनी थी डाक्टर फैसल के साथ.
खैर मास्टर अकील से भी अरशद ने वही सब करा दिया जो एक दिन पहले डाक्टर फैसल को कराया था. आखिर में जब मास्टर अकील को बेंच प्रेस कराने के लिए वेट दे दिया तब सब लडके वहां से गायब होकर जीने के दूसरी तरफ वाली छत पर जा कर छिप गए.
‘ओ मर गया मर गया मर गया’ मास्टर अकील की दबी कुचली आवाज़ में झीनी झीनी सी चीखे सुनायी पडी. अरशद कूद कर छत पर पहुंचा तो देखा वेट बार मास्टर अकील की गर्दन पर लगभग पहुँच ही चुकी थी. चेहरा डाक्टर फैसल की तरह लाल हो चुका था. थोड़ी दूर और निगाह पडी तो मास्टर अकील की सुंडी की जगह कुछ उभरा हुआ नज़र आया. अरशद ने जल्दी से वेट हटाया और मास्टर अकील को खड़ा किया, अकील ने बनियान उपर कर अपने पेट को देखा तो सुंडी की जगह उसकी करीब दो इंच आंत बाहर उभर आयी थी. जैसे तैसे मास्टर अकील को जीने से नीचे उतारा और रवाना किया.
कुछ महीनों बाद पता चला कि डाक्टर फैसल बहुत दिनों तक अपने हाथों को गोल किये घुमते रहे, कई सप्ताह बाद उन्होंने अपनी सैर की प्रक्रिया फिर शुरू की. मास्टर अकील का पेट महीनों खराब रहा और पान की दुकान, चाय के होटलों पर मास्टर अकील की कसरत के किस्से बच्चो और बुजुर्गों को जुबानी याद हो गए. कोई बस उनसे यह पूछ ले कि मास्टर जी अब पेट कैसा है? तो जवाब में वे अरशद सहित पूरे मौहल्ले वालों की मां बहन करते.

रचनाकाल: फरवरी १,२०१५  

स्केच साभार: गूगल