माहे
रमज़ान में उसे अपने जेल खाना नुमा मकान से दो घंटो की छूट घर से मस्जिद जाने के लिये
मिलती थी,
इशा
की नमाज़ के वक्त तरावी जो होती वो बड़ी देर तक होती। खुतबा, दुआ, इबादत के जोड़ घटा के साथ दो घंटे उसे जी लेने
के लिए काफी थे। उसके साथ के हमजोली भी पूरे महीने उसी मस्जिद में मिलते मानो मस्जिद
न हुई कोई अड्डा हो। मस्जिद के इमाम उसके वालिद का एहतराम करते सो वह उनकी नज़रों से किसी थम के पीछे
छिप कर मस्जिद में बैठता।
उस
दिन रमज़ान का पहला जुमा था। मस्जिद नमाज़ियों से वक्त से पहले ही भर गयी थी। जमात खडी
होने तक एक सफ में तकरीबन दो-दो कतारें बैठ चुकी थी। तभी हाशिम थम के पीछे बैठे आबिद
के पास बैठते धीरे से हुए बोला, 'आज बड़ी भीड़ है, अल्लाह ही जाने आज क्या हो'? आबिद ने किसी अनजाने खतरे
की वजाहत करते हुए हाशिम से फुसफुसाते हुए पूछा,'क्यों सब कुछ ठीक तो है तूने
इतनी देर कहाँ कर दी'?
'इतनी भीड़ में शिकार नहीं
आयेगा'
...रुक
कर फिर बोला,
'घर
से निकलने में देर हो गयी थी'। आबिद ने जबाब सुनते ही कहा आज बिजली भी नहीं है शिकार को जरुर
आना चाहिये।
लैम्प और मोमबत्तियों की मंद-मंद रोशनी
में आबिद ने उचक कर नमाज़ियो को वहाँ तक देखा जहाँ तक उसकी आँखे इसकी इज़ाज़त दे सकती।
हाशिम मस्जिद की दूसरी दिशा में देखने लगा। आबिद ने पूछा 'दिखाई दिया' ? 'नहीं, मेरे ख्याल से वो अभी नहीं
आया' हाशिम ने जवाब दिया।
बारहाल वक्त हो चुका सो अज़ान के
बाद जमात खड़ी हो गयी उन दोनों को उनका शिकार न दिखाई पड़ा। दूसरी रकत का अभी सजदा ही
हुआ था कि मस्जिद की पिछ्ली कतारों से माँ-बहन की गालियाँ देने की भारी बुलबुली आवाज़
ने इमाम साहब की आवाज़ को चुनौती दे दी। उसकी फाहशी गालियों को सुनकर कम उम्र के लडके
खी-खी कर के बंदरों की तरह नियत बाँधे-बाँधे मस्जिद में हँसते रहे। ये एक नीम
पागल था जिसका नाम बुलाकी था। पक्का रंग, छोटा कद समाने के दाँत गायब और चेहरे पर चीनी दाढ़ी
जो ठुड्डी से आगे
कभी
बढ़ी ही न थी। साल में एक दो बार उसे उसके घर वाले पकड़ कर नहला देते। उसके कपडे किसी
तप्पड से कम नहीं,
बस
एक कुर्ता नीचे तहमद जैसे इन्होने जिद कर ली हो कि मरते दम तक वे बुलाकी का साथ न छोडेगें। उसकी आवाज़
बहुत भारी थी,
मुहँ
में सामने के दाँतों का दरवाज़ा गायब होने से गले से निकले लफ्ज़, लफ्ज़ बनने से पहले ही हवा
के गुब्बारे बनकर ब्रहमाण्ड में विलीन हो जाते। लिहाज़ा जब बुलाकी बोलता तो हो हो की
आवाज़ अधिक होती लेकिन कयोंकि लोग अभ्यस्त हो चुके थे इसलिए वह उसकी बात समझ लेते थे।
जिसे जब उचंग उठती वो बुलाकी को छेड़ लेता और उसका रेडियो स्टेशन एक ही रिकार्ड प्ले
करता, वो बस माँ की गाली देता।
दूसरे ही पल छेड़ने वाले को अगर बुलाकी से दोस्ती करनी हो तो एक बीड़ी पिलानी होती, बीड़ी देखते ही बुलाकी का
गुस्सा गायब। उसके शैदाई मस्जिद में भी उसका पीछा न छोडते, मौका मिलते ही कोई ने कोई
उसे छेड़ लेता और बुलाकी का रिकार्ड बिना परवाह किये बजने लगता।
सलाम
फेरते ही मस्जिद का इन्तज़ामिया खड़ा होकर शरारत करने वालो को फटकार पिलाता, उन्हें अल्लाह के घर में
अल्लाह से डराने की कोशिश करता। उसकी हाँ में हाँ चमड़े वाला बशीर सबसे पहले उठ कर मिलाता।
बशीर से ही बुलाकी सबसे ज़्यादा डरता क्योंकि वह भी उसे सताने में माहिर था।
सुन्नत
पढ़ते ही हाशिम और आबिद मस्जिद की पिछली सफ में आ गये। तब तक बुलाकी पहला झटका लगते
ही इमाम साहब के बिल्कुल पीछे अपनी नमाज पढ़ने जा चुका था। अभी आधी तराबी भी पूरी न हुई थी कि हाशिम ने आबिद को खबर दी
कि रहीम आढ़ती के नजमु ने बुलाकी के ऊँगली उस वक्त कर दी थी जब वह सजदे में था। तीन
दिन पहले नजमु के भाई हसरत ने बुलाकी के सजदे में जाते ही अण्डे पकड़ लिये थे जिस
पर बुलाकी ने
कायदे
का बवाल काटा था। आबिद और हाशिम को एक दिन और निराश होना पड़ा क्योंकि उनका शिकार हर
बार उनसे बड़ा कोई और शिकारी शिकार कर लेता।
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रचनाकाल
: दिसंबर 16,2012
फोटो
सौजन्य : गूगल

हा हा ...जियो बुलाकी ! लौंडों को तो छेड़खानी के लिए ऐसा शख्श हर मुहल्ले में चाहिए होता है !बहुत सही लिखा शमशाद भाई !
ReplyDeleteBahut bahut shukriya...Santosh Bhai, laga ki likhna sarthak hua..
Deleteदिल में उतर गया सीधे
ReplyDeleteMahesh Bhai, aapke sneh ka hissa ban saka, ye mee liye badi baat hai.
Delete:-)))
ReplyDeleteऐसे-ऐसे भी कैरेक्टर ! मज़ा लेने के तब रूप अलहदा होते थे. बढिया कहा है. और सही कहा, डाइवर्सन पर जान-बूझ कर जाना अच्छा लगता है. :-)))
Saurabh bhai....mere khyal se insan aur insan ke beech tafreeh ke silsilay abhi bhi jaari hongey......bus roop badley hongey...!!!
Deleteबहुत बढ़िया शम्स भाई....
ReplyDeleteKhalid bhai...aapka shukriya..!!!
Deleteहाहाहा... बहुत मस्त और बिंदास है भाईजान... हम तो शिकार से कुछ और ही समझ बैठे
ReplyDeleteथे।
waah shams bhai....
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