समर भाई अपने बाप के इकलौते बेटे थे, वालिद के फौत होने पर पिता का हिस्सा डायरेक्ट उनके खाते में आ गया था, कस्बे के बीचों बीच एक कतार में पांच दुकानें उसके ऊपर रहने के लिए कायदे का मकान, किराए की माकूल आमदनी, यानी बिगड़ने के लिए जितने बाहरी कारक जीवन को चाहिए थे वो सब उनके पास मौजूद। शाम होते ही उनका मुँह किसी तेज़ाबी गंध से महकता, फिर वे सीढियों से उतर कर सलीम पनवाड़ी से पान खाने पहुँच जाते। दिनभर ताश खेलना शाम को शराब,फिर देर रात तक कहीं चौकड़ी। नींद आ गयी तो सो गए और जब सो गए तो दोपहर तक कौन उठे ? समर भाई की नवाबी जिन्दगी का ज़रिया दुकानों से आने वाली किराय की आमदनी ही थी जिसे बढाने की फ़िराक़ में वो अक्सर लगे रहते, पगड़ी वसूल कर कभी नया किरायदार घुसा देना या फिर किराया बढ़ा कर। दुकानें चूंकि मुख्य बाज़ार में थी सो ग्राहकों की कमी न थी खूब चलाती, किरायेदार पैसा बनाता तो उसे किराया बढ़ने पर भी कोई ख़ास ऐतराज न होता।
समर के एक दूर के रिश्तेदार हाजी बकरा जिनका असली नाम असलम था,बकरे का गोश्त बेचने के कारण उनका समाजी नाम बकरा पड़ गया था, अपने लडके को कारोबार कराने के लिए एक दुकान की सख्त जरुरत थी लिहाजा वह पेशगी दस हजार रु समर को थमा गए और दुकान भी बता गए कि उन्हें कौन सी पसंद है। समर ने पैसा फ़ौरन संभाला और कहा की खाली कराने में जो खर्चा होगा वो तुम्हारा। हाजी बकरे ने खर्चे के नाम पर पहले सोचा फिर हाँ कर दी, एक शर्त के साथ कि ईद से पहले दुकान चाहिए। समर के पाले में गेंद फिर आ गयी .. सर खुजाते हुए बोला 'इतनी जल्दी ..ईद तो तीन महीने ही बाद है, हाजी जी खर्चा बहुत हो जायेगा, मैं ईद तक की जिम्मेदारी नहीं लेता, पर बकरा ईद तक की गारंटी, अगर ईद पर खाली हो गयी तो खर्चे के अलग दस हजार और लूँगा'।
हाजी बकरे को पसीना आ गया, माथा साफ़ करते हुए बोला 'खर्चा भी और दस अलग से, अरे अन्यायी जुलम मत कर तेरा भतीजा गुलफ़ाम काम करेगा, कुछ रहम कर दे'. समर ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, 'हाजी जी सल्लू का इनाम पच्चीस हजार नकद पगड़ी और 2000 रु महीना किराया लगा गया एक दूकान के, मैंने मना कर दिया, ये तो आप से रिश्तेदारी का मसला है कि मैंने हाँ कर दी वर्ना मुझे तो ईमान से नुकसान है इस सौद्दे में'. हाजी बकरे को इनाम के नाम पर झटका लगा , इनाम उनका मुखालिफ भी था सो फ़ौरन उनका मर्द जाग गया, 'अच्छा ये बात है, तेरा नुकसान नहीं चाहिए, मैं भी पूरे पच्चीस ही दूँगा'। बात तय हो गयी हाजी जब उठ कर जाने लगे समर ने कहा , 'हाजी जी 100 रु दे दो', हाजी बकरे ने 100 का नोट देते हुए पूछा 'ये किस मद में'? 'खर्चा आज से ही शुरू है, इंशाल्लाह ईद पर गुलफ़ाम का कारोबार शुरू हो जायेगा' समर ने खुलासा करते हुए हाजी बकरे को विदा किया।
कोई डेढ़ माह हो गया समर की परेशानी दिन बा दिन बढ़ती जा रही थी, वजह यह की हाजी बकरा को जो दुकान चाहिए थी उसमें एक लाला हरीश अपनी बिसाती की दुकान कई सालों से चलाते थे , दुकान खूब चलती समर ने लाला से कई बार बात की लेकिन लाला खाली करने के नाम पर बिदक जाये और सीधा कहे की किराया बढ़ा ले, दूकान नहीं खाली करूँगा। एक दो बार दोनों के बीच माँ- बहन की हो जाने के बाद आपसी बातचीत भी अब बंद हो गयी।
एक दिन लाला ने जब सुबह-सुबह अपनी दुकान खोली तो ताले पर मानव मल्ल के दर्शन हुए, ढूंढ़ ढांढ़ कर बड़ी मुश्किल में सफाई कर्मी हाथ लगा पांच रु देकर ताला धुलवाया फिर कही दुकान खुली। अगले दिन लाला ने दुकान खोली तब फिर वही नज़ारा देखने को मिला अब उसे समझ में आ गया कि माजरा क्या है? तीसरे दिन से लाला हरीश घर से ही पानी का लोटा साथ लेकर आने लगा। बेचारा पहले टट्टी धोये फिर दुकान खोले। अब मुसलामानो के मौहल्ले में वह सरेआम समर जैसे आदमी से न तो झगड़ा मोल लेना चाहे न दुश्मनी। घर से लोटा लाते देख उसने समर को जाहिर कर दिया कि इस तीर का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
दो दिन से एक अमरुद बेचने वाला लड़का अपनी ठेली लाला की दुकान के सामने अड़ा कर खडी करे जोर जोर से चिल्लाये 'ले जा ताजे दो रु किलो'. तीसरे दिन लाला के कान उसकी कर्कश आवाज़ से जब गूंजने लगे और उसके ग्राहक बिदकने लगे तब उसने पचास रु एक सिपाही को देकर चार डंडे ठेली वाले को लगवाये तब कहीं जाकर उसकी जान में जान आयी। लाला हरीश समर की दो गोली खा चुका था अब उसकी टेंशन बढ़ने लगी। हाजी बकरा भी एक दिन आकर उसे याद दिला गया कि हफ्ते बाद रमजान शुरू होने वाले हैं और अब तक खर्चे में ली हुई रकम के हिसाब की पर्ची भी उसे थमा गया जो तकरीबन 2600 रु की थी। समर भी हिम्मत हारने वाला नहीं था। उसने अपने बीवी बच्चों को कुछ दिन के लिए ससुराल भेज दिया और पूरे दिन हो हुल्लड़ करने के लिए तेज़ आवाज में म्यूजिक चलना शुरू कर दिया। लाला हरीश को हर रोज एक दो घूरते हुए खतरनाक चहरे दिखाई देते। हफ्ते भर चलती रही इस तरकीब का असर लाला हरीश के संकल्प को न डिगा सका, हां इस शोर शराबे से और गैर मामूली माहौल के चलते उसकी दुकानदारी अब प्रभावित होना शुरू हो चुकी थी। समर के दिमाग का पारा हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहा था। रमजान के दुसरे दिन उसने नया फार्मूला अपनाया। लाला की दुकान के ठीक ऊपर बने कमरे में भरी दोपहरी में उसने पानी भर दिया और हौज बना कर दारू पीकर उसमें लेट गया। मौहल्ले में शोर मच गया समर ने घर में हौज बना ली। लोग उसे देखने आयें, तफरीह करें और चले जाएँ। पुरानी इमारत पानी को ज्यादा बर्दाश्त कर पाने की स्थिती में नहीं थी, लिहाजा पानी रिस-रिस कर लाला की दुकान में टपकने लगा। दुकानदारी छोड़ लाला हरीश अपने माल को संभालने में लगा रहा। इतना बुरा हाल की दुकान के भीतर उसे छाता लेकर बैठने की नौबत आ गयी। उसने पुलिस भी बुलाई , समर ने कहा कि उसका मकान है, रमजान चल रहे है मुझे गर्मी लग रही है मैं अपने मकान के अन्दर हूँ किसी को क्या तकलीफ? रमज़ान की नज़ाकत देखते हुए पुलिस भी बेबस। उसी शाम को लाला हरीश ने ठेली मंगवा कर अपना सामान दुकान से हटा कर दुकान की ताली अपने पडौसी को देते हुए कहा, 'आदमी हो तो लड़ ले- लुच्चे से कौन लड़े भईय्या? ये ताली समर को भिजवा देना'
अगले दिन हाजी बकरे से पूरे बकाया पैसे लेते हुए समर ने एक कागज़ पर हाजी का अंगूठा लगवा लिया, दुकान की ताली साथ आये गुलफाम को देते हुए कहा,'ये एग्रीमेंट है एक साल का अगले साल फिर अंगूठा लगा देना, चलो काम धंधा शुरू करो। दुकान का भाड़ा 2000 रु महीना है, महीने की दस तारीख याद रखना। लाला हरीश समर को हर महीने 1200 रु दिया करता था।
शाम को सलीम पनवाड़ी की दुकान पर समर को सल्लू का इनाम मिला , बोला 'चच्चा तुमने दुकान सस्ते में दे दी, मुझ से जिक्र करते तो मैं 2500 किराया देता और नगद पचास हजार पगड़ी, समर इनाम की कलाई पकड़ कर एक अँधेरे वाले कौने में ले गया और खड़े-खड़े बहुत देर तक बातें करता रहा।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------रचना काल= दिसंबर 16,2012
फोटो सौजन्य : गूगल

अच्छी कहानी है.कुछ लोगों का यह शगल ही होता है कि कैसे दूसरों को बेवकूफ बनाया जाए।
ReplyDeleteJi Ajit Babu, hamarey samaj mein is tarah ke karigar bahut log hain...
Delete:D :D
ReplyDelete:)
Deleteबहुत अच्छी कहानी ,,,सब कुछ है ...मकसद, पात्रों के अनुकूल भाषा ,रवानी और अंदाजे-किस्सागोई ! कुल मिला कर एक बेहतरीन कहानी ! इसे किसी पत्रिका में होना चाहिए ! बहुत बहुत बधाई कामरेड !
ReplyDeleteArun Sir, bahut bahut shukriya aapka...Main sochta hun ki in 15-20 kisson ko ek kitab ki shakl de doon...!!!MAwananama...
Deleteहा हा हा हा.. .
ReplyDeleteशम्शाद भाई, कुछ आपबीतियाँ किस्साओं की तरह पिनक देती हैं. वाह ! और आपके लहज़े में रवानी तो ख़ैर माशाल्लाः .. .
Saurabh Bhai....aapka bahut abhaar, himmat bandhti hai aur honsla bhi badhta hai...apke aaney se.
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