Thursday, February 19, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १७ – बीज युद्ध


कनैडा में बहुत तरह के बीज खाए जाते है, कद्दू, सूर्यमुखी, तरबूज और न जाने क्या क्या, लेकिन खरबूजे के बीज नहीं मिलते जैसे भारत में उन्हें बड़े चाव से खाया जाता है. बीज खाना एक लत जैसा ही है कमबख्त जब तक आख़िरी बीज ख़त्म न हो चैन ही नहीं पड़ता.
गर्मियों की तपती दोपहर में खाना खाने के बाद जब बिजली गुल होती तब सभी भाई बहन और मम्मी के साथ बीज खाने का दौर चलता. बीच बीच में बिजली अगर आ जाती तो फिर कहने की क्या. टेबिल फैन  की घूमती हवा की गति से सामजस्य बैठा कर बीजों के छिलकों को बिना ज्यादा मुँह की हवा का प्रेशर लगाये दूर तक उड़ते देखना, उसका भी अपना ही आनंद था.
हम तीन बड़े भाइयों की इकलौती बहन (दो उससे छोटे भाई) भी साथ में बैठ कर खूब बीज खाती, बीज खाने से ज्यादा उनके छिलके गुडिया के मुँह पर मार कर सताने का अपना अलग ही लुत्फ़ था. शुरू शुरू में उसे लगा कि हवा के रुख से शायद बेसाख्ता ही वह छिलका उसके गाल पर आ कर चिपक गया हो, लेकिन जब बार बार कभी इधर तो कभी उधर थूक में भीगे गीले गीले छिलके उसके मुँह पर बरसने लगे तब वह समझ गयी कि ये खेल है क्या?
खैर वह भी स्यानी थी, सर पर दुप्पट्टा कायदे से बाँध कर, गालों को छिपाने का उसने इंतजाम कर लिया था, अब छिलके मारने वालों को अपने अपने निशाने की महारत दिखानी होती, दस मारो तब कही जाकर दो तीन चिपकते. छिलकों के मुँह पर चिपकने के बाद जो संग्राम होता वह भी देखने लायक मंज़र होता, कई बार माहौल इतना बिगड़ जाता कि गुस्से के बोझ में उसकी आवाज और बारीक पिचकी हुई सी हो जाती और वह सीधी बाउजी के पास जाकर शिकायत करती, फिर बाउजी चिल्लाते, जैसे उनकी जान गुडिया में अटकी हो. थोड़ी बहुत देर शांति रहती, बीजो के छिलकों की बरसात का रुख फर्श की तरफ होता तो कभी पलंग पर..लेकिन थोड़ी देर बाद छिलकों की फितरत ही थी कि उन्हें उड़ कर बिंदास अपनी मुक़र्रर जगह पर जाना ही होता. मम्मी जी इन हरकतों पर नज़र रखती, मना करती, डांटती तो कभी मारती लेकिन कौन सुनता और कौन मानता ?
कई बार हम लोग प्रोग्राम में चेंज कर देते, वह खामोशी से अपनी बीज खाती, हमने बैठने की जगह बदल ली उसके पीछे बैठ कर खाने लगते, गुडिया को लगता कि माहौल शांत है सो वो अपना दुपट्टा उतार कर खाने बैठ जाती, बस फिर क्या धीरे धीरे छिलकों का जमावड़ा उसकी पीठ पर फैले बालों पर जमने लगता तो कभी उसकी कमीज के पल्लू पर. जब वह उठती तो उसे पता चलता कि मामला क्या था. कई बार झुंझलाहट में उसने अपने नुकीले नाखूनों से मुझे नौच कर अपने गुस्से को शांत किया. उसके चांडाल रूप का सबसे ज्यादा शिकार बनते उससे छोटे दो भाई जिन्हें वो कस कर धोती, पिटने से बचने के लिए वो बड़े भाईयों की शरण में आते, उन्हें बचाने पर युद्ध और गति पकड़ लेता.

अब जब भी मैं यहाँ बीज खाता हूँ, अकेला या अपनी बीवी के साथ, छिलके हवा में नहीं उड़ते. अपने पसंदीदा सूर्यमुखी फूल के बीज खाता जरुर हूँ लेकिन हर बीज में उन खरबूजों के बीजों का रस ढूंढता हूँ जिनके साथ अपना बचपन गुजरा, गुजरा वक्त एक महाकाल के रूप में साक्षात मुझे लिपट जाता है, मैं खामोशी से अतीत के बीजों के साथ वर्तमान को आत्मसात करता हूँ.

Tuesday, February 17, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १६ - संघियों की पाद वार्ता


मेरे एक मेरठ के मित्र थे, १९८० के दशक के अंत में राम मंदिर आंदोलन चल रहा था, संघियों ने धार्मिक भावनाओं को चटपटे मसालों में लपेट कर घर घर पर दस्तक दी थी. एक ऐसी की किसी बैठक में शामिल होने का आमंत्रण उन्हें मौहल्ले पड़ौस के लोगों से मिला था, वह जिज्ञासु थे सो चले गए कि जाकर देखा तो जाए आखिर ये लोग करते क्या हैं?
इस खबर पर मेरी त्योरी चढ़ना लाजिम था और मैं भी जिज्ञासु था कि पूछ लूं आखिर मान्यवर क्या गुल खिला कर आये हैं?
अगले दिन जब वह कालिज आये तो मेरे जैसे उत्सुकगण मिल कर उनसे पूछने गए, कि कामरेड आपकी मीटिंग कैसी रही?
उन्होंने पान की पीक थूकते हुए सडा सा मुँह बनाकर जवाब दिया,"अरे वहां तो शहर के सारे लाला लोग इकठ्ठा थे, साले बात कम करते थे पाद ज्यादा मारते थे, मैं तो बीच में से ही उठ कर आ गया" 
उनके जवाब और अन्दांज़े ब्यानी को सुनकर हम सब जोर जोर हंसने लगे. उन दिनों घर- घर गली- गली पैदा की गई इस राजनीतिक विषाक्त वायु का राष्ट्रीय स्वरूप हम देश की संसद और उसके मुखिया तक स्पष्ट देख सकते है.
चित्र सौजन्य : गूगल 

Sunday, February 1, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १५ - दास्ताने वर्जिश


डाक्टर फैसल कस्बे के जाने माने रसूखदार खानदान से ताल्लुक रखते थे, होमियोपैथी की डाक्टरी पढ़ने के बाद अपने ही घर की दुकान में अपना क्लिनिक चलाने लगे थे. गोकि होम्योपैथी की दवा को जिन गोलियों में भिगो कर दिया जाता उस पर कस्बे की जनता को उन दिनों कोई ऐतमाद न था, कोई मछली के अंडो वाली तो कोई मकड़ी के अंडो वाली दावा बता कर अपनी जुबान साफ़ करता.
फैसल क्योंकि खानदानी थे इसलिए आम लोगों में उनका उठाना बैठना कम ही था, लेकिन क्लिनिक चलाने के लिए उन्होने अपने इस रिवायती बोझ को छोड़ कर कस्बे के पढ़े लिखे और पेशेवर लोगों से दुआ सलाम करने का सिलसिला चालू कर दिया था, इसी सोचे समझे मकसद के तहत उन्होंने अहले सुबह सैर पर जाना शुरू किया था. कस्बे के पुराने खेले खाए लोग उन्हें हर रोज सुबह सुबह दिखते, दुआ सलाम होती और साथ ही साथ वह अपने काम का जिक्र ऐसी तरकीब से करते कि दूसरे को बिना बताये यह पता चल जाता कि फैसल होम्योपैथी का बाजाप्ता पढ़ा लिखा डाक्टर है. अपने पेशे के प्रति जनता के अविश्विश्वास को तोड़ने में उन्हें काफी मशक्कतों का सामना था.
नई क्लिनिक की शुरुआत उन्होंने नए कपड़ों से की थी, दो शानदार सफारी सूट सिलवाये गए थे, एक हल्के आसमानी और दूसरा हल्के भूरे रंग का जिन्हें वह अदल बदल कर बड़े शौक और रौब से पहनते. सूट क्योंकि आधी आस्तीनों के थे तो देखने वाले को उनकी सेहत दूर से दिखाई दे जाती. उनके इकहरे बदन पर सफारी सूट यूं तो खूब जंचता लेकिन निगाह जब बाहों पर जाती तो देखने वाले की आँखे डाक्टर साहब को वह सब कुछ बता देती जिसे वह सुनना नहीं चाहते थे.
इक दिन सुबह सुबह जब डाक्टर फैसल सैर करके लौट रहे थे तब उनकी निगाह खैरात अली चौक पर नीम के पेड़ के पीछे छत पर दो तीन नौजवान लड़कों पर पडी जो अपनी रंग बिरंगी बनियानों में करसत कर रहे थे. उनकी निगाहें मिली तो चेहरे जाने पहचाने लगे, दुआ सलाम हुई. डाक्टर फैसल की उत्सुकता ने उनके कदम रोक लिए. जब वह खड़े हो गए तो छत पर खड़े लड़कों ने उन्हें ऊपर आने की दावत दे ही डाली. डाक्टर फैसल की जैसे मुँह माँगी मुराद ही पूरी हो गयी. आखिर ये सभी लडके कस्बे के एक नामचीन डाक्टर के खानदानी थे सो उनका एक पेशेवर रिश्ता तो था ही.
डाक्टर फैसल फुर्ती से जीना चढ़ कर उस कच्ची छत वाले कमरे पर पहुँच गए और वहां वर्जिश का सामान, डम्बल, वेट लिफ्टिंग बार, वेट, इनक्लाइनिंग, डी क्लाइनिंग बैंच, नान चाकू आदि साजो सामान देख कर उनकी आँखे खुली रह गयी.
अरशद भाई कितने बजे शुरू करते हैं आप ?
‘सुबह छ बजे डाक्टर साहब’, अरशद ने फ़ौरन जवाब दिया.
‘ओह आज तो लेट हो गया, क्लिनिक भी खोलना है मैं कल आता हूँ’. डाक्टर फैसल ने खुशी खुशी में फ़ौरन जवाब दिया और इज़ाजत ली, दुआ सलाम करके कल सुबह आने की बात तय हो गयी.
डाक्टर फैसल ने अगले दिन सैर पर जाने से बेहतर सीधे वही आने का निर्णय लिया. रात भर वह यह सोच सोच कर खुश होते रहे कि अब उनका शरीर भी सफारी सूट पहनने के लायक हो जायेगा, अब उनकी पतली पतली बाँहों में उन नौजवान लड़कों की तरह मछलियाँ दिखेंगी, अब उनका सीना पेट से बहार उभरा हुआ दिखेगा, अब उन्हें अपने मरीजों के सामने किसी अहसासे कमतरी का शिकार नहीं होना पड़ेगा.
खैर अगले दिन मुक़र्रर वक्त पर डाक्टर फैसल वर्जिश करने पहुँच गए. वहां पहले से ही तीन चार लडके अपने अपने काम में लगे थे. डाक्टर साहब ने आते ही सबसे पहले डम्बल पकड लिए और ...
‘अरे ये क्या कर रहे हो डाक्टर साहब, पहले वार्म अप कर लें’ अरशद ने उन्हें मशविरा दिया.
ओह हाँ, यू आर राईट’
उनके सामने लडके उस वक्त दंड पेल रहे थे.
ये कितने कितने मारते हैं? डाक्टर साहब ने लड़ाकों की तरफ इशारा करके पूछा.
ये तो कोई २०० मारता है कोई तीन सौ कोई पांच सौ.
आप आज पचास मार ले, पहला दिन है आपका.
हाँ, पचास ठीक है.
डाक्टर साहब दंड मरने के लिए जैसे ही तैयार हुए, अरशद ने फिर टोका.
‘डाक्टर साब, ये पहले हल्की स्ट्रेचिग वर्जिश कर चुके हैं, फिर बैठक मार चुके है अब ये दंड मार रहे है’.
ओह यस यू आर राईट. डाक्टर साहब ने धीरे धीरे उछलना कूदना शुरू किया थोड़ी देर बाद उन्होंने बैठके लगानी शुरू की, पूरी पचास बैठक मारते मारते पसीने की बूंदे उनके माथे पर चमकने लगी. पचास बैठकों के बाद थोडा सांस लिया, इधर उधर घूमे, फिर दंड पेलने शुरू किये. दस दस की किस्तों में उन्होंने पांच बार सांस लिया और पूरे  पचास दंड पेल दिए.
उसके बाद उन्होंने थोड़ी देर डम्बल घुमाए और फिर जम कर बैंच प्रेस लगाई. थोडा रुक रुक कर ही सही करीब एक घंटे तक डाक्टर फैसल अपने ख़्वाबों को हकीकत में तब्दील करने वाले काम को अंजाम देते रहे. उनका पसीना अब चमड़ी के सुराख खोलते हुए बाहर उनकी टी शर्ट पर साफ़ नक़्शे बना चुका था. उस दिन उन्हें लगा कि आज उन्होंने बहुत मेहनत की है. जीना उतरते हुए दीवार में बंधी रस्सियों पर उनके हाथ बेसाख्ता पहुँच गए. जैसे ही चौक पर पहुंचे तो उनकी निगाह मास्टर अकील पर पडी. अकील साहब भी उनके हम उम्र और कद काठी में डाक्टर फैसल के जुड़वाँ भाई से थे. दोनों की दुआ सलाम हुई, मास्टर अकील को पूछने की जरुरत नहीं हुई, डाक्टर फैसल के कपड़ो में पसीने ने सब कुछ खुद ब खुद कह दिया.
बहुत बढ़िया डाक्टर साहब, सैर वैर में कुछ नहीं रखा, मैं भी कल आपके साथ ही आता हूँ.
डाक्टर साहब ने मुस्कुरा कर रजामंदी दी और विदा हुए. आज उन्हें अपना वजन इतना बढ़ा हुआ लग रहा था कि उसे ढोने में टांगों को काफी मेहनत करनी पड़ रही थी.
अगले दिन सवा छः बज गए, सभी को डाक्टर फैसल का इंतज़ार था, कसरत करते करते एक लडके से जब रहा न गया तो दीवार पर टंगे घंटे को देखते हुए एक लडके ने अरशद से पूछ ही लिया
“चच्चा, डाक्टर साहब नहीं आये अब तक”
‘मुझे क्या पता, क्यूं नहीं आये, आयेंगे भी कि नहीं आयेंगे” अरशद के चेहरे पर जवाब के साथ एक कुटिल मुस्कान थी.
इससे पहले कि वह अगला सवाल करता जीने से किसी के आने की आवाज़ आयी, जिसे सुनकर अरशद ने मुँह पर ऊँगली रख कर खामोश रहने का इशारा किया. जूतों की आवाज़ नज़दीक होती गयी और सब की निगाहें दरवाज़े की तरफ लेकिन रिजल्ट देख कर मन ही मन सब चौक गए. मास्टर अकील को ट्रेक सूट में देखकर कर सबने स्वागत किया. लेकिन मास्टर अकील ने सबसे पहले प्रश्न किया, डाक्टर फैसल नहीं आये आज?
अरशद ने जवाब दिया, ‘आते होंगे, आप कैसे आ गए’ ?
आज से मुझे भी वर्जिश शुरू करनी थी डाक्टर फैसल के साथ.
खैर मास्टर अकील से भी अरशद ने वही सब करा दिया जो एक दिन पहले डाक्टर फैसल को कराया था. आखिर में जब मास्टर अकील को बेंच प्रेस कराने के लिए वेट दे दिया तब सब लडके वहां से गायब होकर जीने के दूसरी तरफ वाली छत पर जा कर छिप गए.
‘ओ मर गया मर गया मर गया’ मास्टर अकील की दबी कुचली आवाज़ में झीनी झीनी सी चीखे सुनायी पडी. अरशद कूद कर छत पर पहुंचा तो देखा वेट बार मास्टर अकील की गर्दन पर लगभग पहुँच ही चुकी थी. चेहरा डाक्टर फैसल की तरह लाल हो चुका था. थोड़ी दूर और निगाह पडी तो मास्टर अकील की सुंडी की जगह कुछ उभरा हुआ नज़र आया. अरशद ने जल्दी से वेट हटाया और मास्टर अकील को खड़ा किया, अकील ने बनियान उपर कर अपने पेट को देखा तो सुंडी की जगह उसकी करीब दो इंच आंत बाहर उभर आयी थी. जैसे तैसे मास्टर अकील को जीने से नीचे उतारा और रवाना किया.
कुछ महीनों बाद पता चला कि डाक्टर फैसल बहुत दिनों तक अपने हाथों को गोल किये घुमते रहे, कई सप्ताह बाद उन्होंने अपनी सैर की प्रक्रिया फिर शुरू की. मास्टर अकील का पेट महीनों खराब रहा और पान की दुकान, चाय के होटलों पर मास्टर अकील की कसरत के किस्से बच्चो और बुजुर्गों को जुबानी याद हो गए. कोई बस उनसे यह पूछ ले कि मास्टर जी अब पेट कैसा है? तो जवाब में वे अरशद सहित पूरे मौहल्ले वालों की मां बहन करते.

रचनाकाल: फरवरी १,२०१५  

स्केच साभार: गूगल 

Sunday, January 11, 2015

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १४ - बेटा शिव शंकर


इंटर पास करते ही जब छात्र कालिज में प्रवेश  लेते हैं तब उनका नजरिया अपने पूर्व अध्यापकों के लिए एक दम बदल जाता है. लड़कों द्वारा बनाई मास्टरों की मेरिट लिस्ट निरंतर सिकुड़ती जाती है. जिन मास्टरों को देख कभी उनकी पतलूने गीली हुआ करती थी, अब उन्हें देख वह न नज़र बचाते बल्कि एक अजीब अंदाज में वो हरकतें करते कि मास्टर जी की निगाह उन पर पड़ जाए. लिहाज की जगह शरारत तो कभी-कभी उद्दंडता की हदों को पार कर जाती. छात्र यकीनन अपने को पीड़ित समझते और पूर्व अध्यापकों को उत्पीड़क. कुछ ज्यादा जी सृजनशील, उर्जावान  छात्र इन उत्पीड़कों को मजा चखाने के लिए लालायित भी रहते.
लुढ़कते-पुढ़कते उन दोनों ने इंटर पास कर लिया था, गरीब और कम पढ़े लिखे समाज से क्योंकि उनका ताल्लुक था, तो समाज में सीना तान कर चलने का अप्रत्याशित बल अब उनके पास था. कालिज में बिना ड्रेस ताने फेशनेबिल कपड़ों के साथ, हाथ में दो एक किताबों के साथ डायरी लेकर चलने का सुख भोगने को जैसे वह जन्मो जन्मो से आतुर हों. घर वालों की भी पहले जैसी पहरेदारी से मुक्त हुए दोनों दोस्त अब  देर रात कस्बे के दूसरे छोर पर चाय पीने जाते और मटरगश्ती करते. गलियों में जब सन्नाटा पसर जाता और किसी राहगीर के कदमो की आवाज़ सुन कर गलियों के कुत्ते उंघते हुए बैठे बैठे भोंकते, यह रात का वो पहर होता जब वे एक दूसरे से विदा लेते.
वह कोई दो सौ मीटर लंबी गली रही होगी जिसके दोनों सिरे खुले थे. नगरपालिका ने किफ़ायत बरतते हुए इस गली के दोनों सिरों के बिजली के  खंबों पर बल्ब लगाये थे जिनकी रोशनी १०-१५ फिट के बाद ही दम तोड़ देती नतीजतन  गली के बीचों बीच घुप्प अँधेरा रहता. इस गली के एक छोर पर कोई १० मीटर के बाद ही एक मकान में मास्टर शिव शंकर तिवारी रहते थे जिन्होंने उन्हें इंटर तक अंग्रेज़ी और संस्कृत पढाई थी. मास्टर जी की दिनचर्या बड़ी सात्विक थी, स्कूल से लौटते ही आधा घंटे के बाद उनका ट्यूशन का कारोबार परवान चढ़ता. एक के बाद एक बैच रात के आठ बजे तक चलता. सुबह स्कूल जाने के समय से पहले भी वह दो बैच पढ़ा चुके होते. दिनभर के इतने व्यस्त कार्यक्रम के बाद रात  नौ बजे तक  तो वह इतनी गहरी नीद में होते कि उनकी खर्राटे दरवाजे तक सुनायी पड़ते. ऐसे गरजदार माहौल में कोई कुत्ता भी गली के उस इलाके में सोना पसंद नहीं करता.
उन दोनों दोस्तों को मास्टर शिव शंकर से कुछ ज्यादा ही लगाव था. एक दिन रात के करीब ग्यारह बजे उन्हें इस गली से गुजरते हुए  खर्राटों की भयानक आवाज़ ने कक्षा आठ से कक्षा १२ तक का इतिहास साक्षात सामने लाकर पटक दिया. उनके शैतानी दिमाग ने तुरत फुरत प्रतिक्रिया करनी ही थी. दरवाज़े के पास जाकर उनमे से एक ने गले का गियर बदल कर आवाज़ लगाई “बेटा शिव शंकर” और इससे पहले कि कोई नतीजा सामने आये दोनों फर्राटा लगा कर गली के उस घुप्प अँधेरे में किसी प्रेत की तरह समा गए.
दो तीन दिन यह सिलसिला चला, उस दिन बड़े अनमने मन से उसने रात के उसी पहर में आवाज़ लगाई, ‘बेटा शिव शंकर” दरवाज़े के उस तरफ से फ़ौरन जवाब मिला ‘जी पिता जी, अभी आता हूँ”. अभी आता हूँ के साथ लाठिया के सिरे में लगे लोहे के कैप की फर्श पर पटकने की आवाज़ साफ़ सुनाई पडी. आदतन उन दोनों के मद्धम पड़ते साए बिजली की सी तेज़ी के साथ अँधेरे में समा चुके थे. आज उन्हें अपनी मुसलसल मेहनत का नतीजा पहली बार मिला था, वे दोनों बड़े खुश थे.
अब वे दोनों भी सयाने हो गए थे, दो दिन के अंतराल के बाद रात के उसी पहर में उन्होंने फिर वही हरकत की, अबकी बार ‘अभी आया हरामजादे’ के जवाब के साथ दरवाज़ा फौरन खुलने की आवाज़ भी साथ हुई. मास्टर जी पूरी तैय्यारी के साथ चौकस पहरे पर बैठे थे. अब उन्होंने दरवाज़ा खोल कर ट्यूशन पढाना शुरू कर दिया था ताकि गली से हर आने जाने वाले पर नज़र रख सकें. अब देर रात तक मास्टर जी की बैठक में ट्यूब लाईट जलने लगी थी, शनिवार की रात तो अभूतपूर्व रूप से ग्यारह बारह बजे तक मास्टर जी की बैठक का दरवाज़ा खुला रहता और आने जाने वाले को उनका गणेशी रूप स्पष्ट दिखता.
गुरु जी नमस्ते, एक रात उन दोनों ने मास्टर जी के दरवाजे से गुजरते हुए एक स्वर में प्रणाम किया. ‘नमस्ते बेटे’, मास्टर जी ने दोनों के चेहरों को पहचानने की मुद्रा में फ़ौरन जवाब दिया.
‘गुरु जी कैसे इतनी रात तक ...? अभी सवाल पूरा भी नहीं हुआ था
‘कुछ नहीं, कोई आने वाला है उसकी इंतज़ार में हूँ’.
‘लेकिन ये लाठी’?
“बेटे, कुत्ते बहुत हो गए है गली में”
लेकिन तुम लोग इतनी रात यहाँ कैसे ? मास्टर जी ने सवाल दाग़ दिया.
“गुरु जी, दादा जी की तबियत खराब है उनकी दवाई लेने गया था”  
‘ओह, समझा’ ..  
मास्टर जी का जवाब सुनकर दोनों आगे बढ़ गए और गली पार करते ही एक दूसरे को देख कर जोर जोर हंसने लगे.

रचनाकाल : जनवरी १२,२०१५  
स्कैच साभार: गूगल       


Saturday, June 28, 2014

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १३- गर्म,लंबा,ठंडा –रोज़ा

‘भाई जी वापसी की टिकट कब की बुक कराई है’ ?
सऊदी में काम कर रहे व्यक्ति ने कनैडा के मित्र को स्काईप पर हो रही वार्ता में जबाव दिया..
‘४ जौलाई’.
‘४ जौलाई क्यों? रोज़े चालू हो ही गए हैं तो ईद के बाद आओ, इस महीने की तनख्वाह तो फ्री की ही है, उसका नुकसान क्यों कर रहे हो, रमजान के दिनों में वहां काम होता कहाँ है? मालिक लोग या तो यूरोप निकल जाते हैं अगर नहीं गए तो अपने घरो में रहते है, नौकर लोग दस बजे से जोहर की नमाज़ तक दफतरों में अधमरे से हुए रहते है. जोहर के बाद घर जाकर इफ्तारी तक दबाकर सोते है...लोकल सऊदी बेचारे रात भर जाग-जाग कर सहरी का इंतज़ार करते फिर फजिर की नमाज़ के बाद बिस्तर पकड’....बात अभी पूरी ही नहीं हुई थी कि वह बीच में टोकते हुए बोला.   
‘...नहीं भाई इधर गर्मी बहुत है’.
‘ओह, उधर गर्म है लेकिन इधर लंबा बहुत है...आप कौन सा ऊँट पर बैठ कर आफिस जाते हो हुज़ूर’? कनैडियन मित्र ने मझाईया लहज़े में जवाब दिया.
‘लंबा भले ही हो लेकिन ठंडा तो है’.
‘अच्छा आपको ठंडा रोज़ा चाहिए, भले ही लंबा हो सुबह ५:३९ से रात ९:०४ तक सूरज रहता है इधर, फीता डाल कर नाप लो हुजूर’ ...
‘तौबा तौबा, आप कैसी बाते करते है करामत भाई, नाऊज़बिल्लाह’...
‘भाई जी करामत का काम है ठोक पीट करना, भले ही रोज़ा क्यों न हो’.
सऊदी से बात कर रहे सलीम ने स्काईप आफ़ कर दिया.      

Saturday, June 1, 2013

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १२ - एक थे भाई

 भाई हमीद, किसी जमाने में उनकी अपने हवेली नुमा मकान पर पूरी हकूमत हुआ करती थी. जब मकान के  सभी कमरों में उनके लडके बस गए तो उनकी मशहरी दालान में आ गयी. जब दालान में उनके लड़कों  के बच्चों  का शोर बढ़ने लगा तो उनकी  चारपाई बाहर बैठक में आ गयी. जब बैठक में उनके लड़को के व्यापारी  दोस्त आने-जाने लगे तब, उनकी खाट मकान के दरवाजे पर आ गयी. भाई की घरवाली को गुज़रे एक अरसा हो चुका था. चार बेटो के चार चूल्हों से कुछ न कुछ कोई न कोई उन्हें दे ही देता.  उम्र के  अब इस दौर में पहुँच कर  उनके नाम से हमीद गायब हो चुका था, बस अब नाम के नाम पर जो लफ्ज़ बचा था, वह था भाई. घर के बाहर के सभी लोग उन्हें भाई कह कर ही बुलाते. खैर पूरी गर्मियों में भाई की खाट दरवाजे के बाहर होती. दोपहरी में वह बैठक में होते शाम और रात को फिर उनका बाकी वक्त उसी खाट पर घर के बाहर कटता.

भाई की खाट मुहल्ले, पास पडौस के लड़को का एक छोटा मोटा अड्डा बन गया था. कोई आता जाता तो भाई से पूछता कि रफीक आया था क्या ? रफीक आता तो भाई से पूछता शमीम आया था क्या ? शमीम आता तो वहीद के बारे में पूछता. भाई का मूड ठीक होता तो जवाब दे देते वर्ना गाली देकर कहते..तेरे बाप का नौकर हूँ मैं ? अबे मुझे डाकिया समझ लिया क्या ? खैर भाई जब ज्यादा गुस्से में होते तो कोई भी एक बीडी जलाता और उनके हाथ में थमा देता, भाई को थोड़ा सकूं हो जाता. उम्र के जिस ढलानदार पुल पर  भाई खड़े थे वहां एक-एक करके बहुत सी चीजे उनका साथ छोड़ रही थी, जैसे सर के लगभग सारे बाल गायब हो चुके थे, यहाँ तक की कि उनके  गालों  तक पर कोई बाल न आता. ले दे कर ठुड्डी पर चार पांच बाल आते जिन्हें वह खुद  कुतर लिया  करते. मुंह के भीतर  अब एक भी दांत नहीं बचा था, सब झड चुके थे. सो चबाने का डिपार्टमेंट एक मुद्दत से बंद  था. एक कान से सुनाई देता दूसरे से नहीं. जाने क्यों ...उनकी नज़र ठीक थी कि सबके चहरे पहचान लेते.

गुजरते वक्त और हालत ने मानो  सारा हिसाब उनकी चेहरे की झुर्रियो में रकम कर दिया हो. चेहरे पर इतनी झुर्रियां थी जैसे किसी नाराज़ बच्चे को होम वर्क करने के लिए कहे और वह अपनी कापी को बेतरतीब कीरम कांटियों से भर दे. ऊपर से रंग उनका काला, अब आप समझ ही सकते है कि जिस मंज़र का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ वह कश्मीर से कितना मिलता जुलता होगा ? गुजरती उम्र ने भाई की तुनक मिजाजी में हर साल इजाफा ही किया. उनके आस-पास रहने वालो और रिश्तेदारों  का यही कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में  मंहगाई और भाई के गुस्से में कभी गिरावट नहीं देखी. चाहे कोई भी सरकार हो ..नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव तक ने, ‘दोनों’ को हमेशा बढ़ाया ही, घटाया कभी नहीं.

भाई सलाम, रफीक ने भाई को दूर से सलाम किया और उनकी पायेंती आकर बैठ गया. भाई सरक कर खाट के सिरहाने हुए.

‘शमीम नहीं आया अभी या आ के चला गया’ ? रफ़ीक ने एक साँस में दो सवाल पूछ लिए.

‘मुझे न पता, मैं उसके या तेरे पीछे रहूँ’ ? भाई ने जला भुना जवाब देते हुए कहा.

‘बडे नाराज हो रहे हो भाई, रोटी नहीं मिली अभी तक शायद’....रफीक की बात अभी पूरी भी नहीं हुई कि भाई बरस पड़े.

‘अबे ओ भूखे खानदान के रईसजादे, मुझे क्यों न मिलती रोटी, शलजम गोश्त खा के बैठा अभी, तेरी तरह न की हांडता फिरूं गली गली’.

‘ओय होय, आज तो शलजम गोश्त मिल गए, क्या बात है? तभी कलफ लग रहा है जुबां पर’ ....रफीक की बात पूरी भी नहीं हुई कि शमीम वहां आ गया.

‘अबे क्यों छेड़ रहा है भाई को’ ...बीच बचाव करते हुए शमीम बोला.

‘मुझे ने छेड़ रहा कोई, इसे ले जा यहाँ से मेरे कान खा रहा है’....भाई ने शमीम को जवाब दिया.

शमीम ने कुल्फी वाले को आवाज लगाई, एक खोये वाली कुल्फी भाई के लिए मंगवाई. भाई ने कुल्फी खाई और शमीम  को खाट पर बैठा लिया. शाम ढल चुकी थी. अब आधी रात तक शमीम की जगह भाई की खाट पर  पक्की हो चुकी थी.

रफीक झटके के साथ खाट से उठा और अपने चूतड़ों पर खुजाते हुए बोला ‘भाई की खाट के खटमलो को बस मेरा ही खून चाहिए, भाई के पास तो अब कुछ बचा नहीं उनके लिए, बस मेरे आते ही उनकी दावत हो जाती है’

भाई को बहलाने  के लिए सबसे अच्छा तरीका था भाई के जवानी के दिनों की चर्चा को शुरू करना, जिसका आगाज़ अक्सर  क़स्बे के किसी पुराने रईस के घर खानदान का नाम उछाल कर आसानी से किया जा सकता था. फिर क्या ..भाई शुरू हो जाते और जाने किस किस की पुलिए खोलते ..साथ साथ वह अपनी काली घोडी के किस्से बताते जिसकी  तीन पुश्ते उनके यहाँ पली ..जिसकी पीठ पर बैठ कर आस पास के गाँवों में भाई  व्यापार करने जाते थे. अब तक कोई दो घंटे हो चुके थे रफीक और शमीम ने भाई से उनकी घोडी और जवानी का जिक्र करके जो शानदार मूड और फिज़ा बनायी थी कि रफीक के ‘खटमल काण्ड’ ने भाई को उनकी जवानी वाले दिनों के नास्टोलजिया से एकदम तपते हुए यथार्थ पर पटक दिया. भाई तिलमिला गए और गाली देते हुए अपनी लाठी उठायी और दोनों को खदेड़ते हुए बोले...’चलो भागो  यहाँ से, कमीनो....खटमल होरे यहाँ...अबे खटमलो के गूदड़ो में पैदा हुए तुम ..मेरी खाट में खटमल बता रहे हो...चलो भागो यहाँ से, दफा हो’

शमीम को लगा कि रफीक ने मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ कर दिया है, अब भाई बिगड़ चुके है. लाठी भी उठ चुकी है. भाई को बिगड़ते देख दो चार राहगीर तफ़रीह के लिए फौरन जमा हो गए और रफीक, शमीम को कोसने लगे. माहौल की नज़ाकत को दोनों ने समझा और मौके से खिसक लिए.

थोड़ी देर बाद, रात और गहरी हो चुकी थी ..आस पास की सभी दुकाने बंद हो चुकी थी. क़स्बे  के दूसरे कौनो में अपने खोमचे-ठेली  लगाने वाले भी सुस्ताते-सुस्ताते अपने-अपने घरो के तरफ रवाना हो चुके थे. एक हाथ में पंखा झलते भाई अपनी खाट पर औंधे मुंह लेते हुए थे कि आवाज आयी.

‘भाई सोये नहीं अभी? आज गर्मी बहुत है लो सिगरेट पी लो ..नींद आ जायेगी’

भाई को नींद कहाँ आ रही थी, वह अलसाते हुए बैठे कि रफीक ने उनकी उंगलियों में सिगरेट फंसा दी. सामने फिर रफीक और शमीम  को भाई ने सख्त निगाहों  से देखा और फिर अपनी उंगली में सुलगती हुई सिगरेट को देखा ..सिगरेट ने अपना रूतबा दिखा कर बाजी मारी.नफ़रत और गुस्से को गिराते हुए वह उठी और पोपले होठों में जाकर घंस गयी ..जिसके एक सिरे से हवा अन्दर की तरफ सरकी तो दूसरे सिरे पर शोला कुछ और सुर्ख रूह हुआ. ये सिलसिला अभी दो चार बार ही हुआ था कि भाई खाट  पर सीधे लेट गए. रफीक ने बाकी बची हुई सिगरेट उनकी ऊँगलियों से निकाली और शमीम के साथ उठ कर, एक गहरा कश लगाते हुए चल दिया.

बेशुमार मक्खियों मच्छरों की भिनभिनाहट, कान, आँख, नाक, मूँह में उनकी अनचाही दखलअंदाजी के चलते भाई की जब आँख खुली तो उनकी पहली निगाह आसमान में गयी. गौर से देखा तो पाया कि यह आसमान का वह हिस्सा नहीं जिसके दर्शन उन्हें हर रोज़ होते थे, ये कुछ अलग है ..दाहिनी तरफ करवट पलट कर देखा तो लाला बसंती की कपड़ो की दुकान गायब थी, दूसरी तरफ पलट कर देखा तो उनके घर का दरवाज़ा गायब. अब तक उन्हें अपनी लोकेशन बदली होने पूरा यकीन हो चुका था.

भाई ने जैसे ही अपनी खाट छोड़ने के लिए पाँव ज़मीन पर रखने की कोशिश की तो नीचे का नज़ारा भी बदल हुआ था. उनकी खाट मौहल्ले की उस कूड़ी पर थी जिसे सफाई कर्मी हफ्ते में सिर्फ एक दिन साफ़ करते. नाली की कीचड़, सब्जी मंडी का कचरा, मौहल्ले वालो की गंद और आस पास के दुकानदारों का कबाड़ा इसी कूड़ी पर सड़ता रहता जिसमे दिन चढ़ते ही सूअर आ जाते और दिन भर वही लोट मारते. भाई ने देखा उसकी चप्पले भी कीचड़ पर रखी है जो कुछ जम चुकी थी. भाई ने अपनी चप्पलो को झुक कर हाथ से उठाने की कोशिश की. घिसी हुई चप्पले  कीचड़ से चिपक चुकी  थी. भाई ने थोड़ी सी ताकत के साथ उन्हें उठाया तो छपाक से वह उनके हाथ में आयी जरुर लेकिन कीचड़ ने अपना काम किया. कुछ वजनदार कीचड़ की छींटे सीधे भाई के मुँह पर आ बैठी, बस फिर क्या ..भाई ने बिना किसी सूचना के जो हाय तौबा; रोना पीटना और गालियों का कार्यक्रम सुबह-सुबह शुरू किया, उससे आस पास के कई घरो में सवेरा वक्त से पहले हो गया. जल्दी ही उनकी खाट और कूड़ी के इर्द गिर्द लोगों की भीड़ इकट्ठी ही गयी, कुछ हंस रहे थे  तो कुछ गालियाँ दे रहे थे. बारहाल  भाई की खाट को भाई सहित बड़ी हील हुज्जतों के साथ मौहल्ले वालो ने कूड़ी से बाहर निकाला.

पीपल के पेड़ के पीछे खड़े शमीम और रफीक दूर से यह नज़ारा देख कर जोर-जोर से हंस-हंस कर दुहरे हुए जा रहे थे. दंभ से भरे रफीक ने कहा, ‘देखा सिगरेट का कमाल...’

‘हाँ माल अच्छा था’....शमीम ने जवाब दिया, दोनों तेज़ी से  अपने अपने घरो की तरफ लपक लिए.

रचनाकाल : जून १,२०१३ 
फोटो सौजन्य : गूगल                                               

Monday, May 20, 2013

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से- भाग ११- मकैनिक महबूब



मौजूदा पागल महबूब की ज़िंदगी को दो हिस्सों में तकसीम करके देखा जाए तो अच्छा. उसके पागल होने से पहले और पागल होने के बाद. वजह, क्योकि वह पैदाइशी पागल नहीं है. और वह पागल है भी या नहीं यह  किसे मालूम? किसी के पास इसका कोई पुख्ता सबूत तो है  नहीं कि वह सचमुच में पागल ही है. लेकिन समाज का अपना गति विज्ञान है उसके अपने नियम है, कोई उसकी गली में जाकर किसी बच्चे से भी पूछे कि महबूब का घर कौन सा है तो पहले कहेगा ..’वो पागल महबूब’?

पागल होने से पहले, मेरा मतलब महबूब जब ठीक ठाक था, नौजवान था और नौजवानों कि तरह उसका दिल मचलता था, हँसता, गाता, लड़कियों के साथ रोमांस करता, शायरी करता था- उन दिनों वह एक साधारण  नौजवान की सारी खूबियों से लैस था. पहले वह साईकिल चलाता था, बहुत तेज़, फिर मोटर साईकिल चलाता था वह भी बहुत तेज़, यहाँ तक की वह जब  ट्रैक्टर भी  चलाता था तो अपने अलग ही अंदाज़ में..उसकी तेज़ी को देख कर समाज ने उन दिनों उसे एक अलग नाम दे रखा था ‘चील’. साइकिल-मोटर साइकिल चलाते वक्त उसके सख्त घुंघराले बाल भी उड़ते थे, जिन्हें देख कर किसी खुराफ़ाती दिमाग ने उसका नाम ‘चील’ रख दिया था.

हुआ यूं कि जब आवारा फिरते उसे एक अर्सा हो गया तब उसके वालिद ने उसे कोई काम धंधा  करने की सलाह दी. सो उसने पहले वही काम सीखने का निर्णय लिया  जिसका उसे शौक था. मोटर साईकिल; वह भी बुलेट मोटर साईकिल,  उसका काम क़स्बे  के एक नामवर मिस्त्री से सीखा और फिर अपनी  दुकान खोल ली. उसकी दुकान खूब चलती. आस पास के जाट-गूजर काश्तकारों के  गाँवों में उसकी जान पहचान पहले से थी जिसने  उसका काम आसान कर दिया. बस फिर क्या जो भी मोटर साईकिल ठीक होने के लिए आये; तो एक बार ठीक करने से पहले और एक बार ठीक करने के बाद, वह बुलेट पर सवार होकर क़स्बे के बीचो बीच ‘ट्राई’ के लिए जाता. रास्ते में पान की दुकान से पान भी  खाता. दिन भर में  १०-२० बार उसका यह ‘ट्राई’ अभियान होता ही, सो उसका  नाम ‘चील’ पड़ना, इक तरीके से मुनासिब ही था.

एक दिन महबूब एक बुलेट का इंजन खोले बैठा था, अब मोटर साईकिल के फ्रेम में बस गद्दी अटकी हुई थी बीच का माल महबूब खोल कर साफ़ सूफ कर रहा था. इसी मोटर साईकिल की गद्दी पर कमर झुका कर बुलेट का मालिक महबूब को काम करते करते देख रहा था कि महबूब ने बड़ी जोर से रिहा खारिज की. बेसाख्ता महबूब और गाडी के मालिक की नज़र आपस में टकराई जिसने महबूब के चेहरे पर अजीब सी शैतानी मुस्कान ने उसकी मूछों के नीचे होठों को खींच लम्बा कर दिया था अभी उसके नुमायशी दांत बाहर ही निकले थे कि मोटर साईकिल का मालिक चौधरी बोला-

‘लाल्ला, जा तेरी उंगली पे लग रा, तनक नीच्चे भी लगा ले. सुक्खी रैंक री’

जाट के इस तुरत बुद्धि जनित वाक्य को सुनकर महबूब की  निगाह अपनी उँगलियों पर लगे ग्रीस पर जम गयी और उसका  मुंह खुला का खुला रहा गया. इस नज़ारे को देख कर उसके पास काम सीख रहे चेले चपाटे  लड़को की हंसी छूट पडी. फिर क्या चौधरी साहब, महबूब और उसके चेले जोर-जोर से खूब देर तक हँसते रहे...
रचना काल: मई १६,२०१३   
फोटो सौजन्य : गूगल