इंटर पास करते ही
जब छात्र कालिज में प्रवेश लेते हैं तब
उनका नजरिया अपने पूर्व अध्यापकों के लिए एक दम बदल जाता है. लड़कों द्वारा बनाई
मास्टरों की मेरिट लिस्ट निरंतर सिकुड़ती जाती है. जिन मास्टरों को देख कभी उनकी
पतलूने गीली हुआ करती थी, अब उन्हें देख वह न नज़र बचाते बल्कि एक अजीब अंदाज में
वो हरकतें करते कि मास्टर जी की निगाह उन पर पड़ जाए. लिहाज की जगह शरारत तो कभी-कभी
उद्दंडता की हदों को पार कर जाती. छात्र यकीनन अपने को पीड़ित समझते और पूर्व
अध्यापकों को उत्पीड़क. कुछ ज्यादा जी सृजनशील, उर्जावान छात्र इन उत्पीड़कों को मजा चखाने के लिए लालायित
भी रहते.
लुढ़कते-पुढ़कते उन
दोनों ने इंटर पास कर लिया था, गरीब और कम पढ़े लिखे समाज से क्योंकि उनका ताल्लुक
था, तो समाज में सीना तान कर चलने का अप्रत्याशित बल अब उनके पास था. कालिज में
बिना ड्रेस ताने फेशनेबिल कपड़ों के साथ, हाथ में दो एक किताबों के साथ डायरी लेकर
चलने का सुख भोगने को जैसे वह जन्मो जन्मो से आतुर हों. घर वालों की भी पहले जैसी
पहरेदारी से मुक्त हुए दोनों दोस्त अब देर
रात कस्बे के दूसरे छोर पर चाय पीने जाते और मटरगश्ती करते. गलियों में जब सन्नाटा
पसर जाता और किसी राहगीर के कदमो की आवाज़ सुन कर गलियों के कुत्ते उंघते हुए बैठे
बैठे भोंकते, यह रात का वो पहर होता जब वे एक दूसरे से विदा लेते.
वह कोई दो सौ
मीटर लंबी गली रही होगी जिसके दोनों सिरे खुले थे. नगरपालिका ने किफ़ायत बरतते हुए इस
गली के दोनों सिरों के बिजली के खंबों पर
बल्ब लगाये थे जिनकी रोशनी १०-१५ फिट के बाद ही दम तोड़ देती नतीजतन गली के बीचों बीच घुप्प अँधेरा रहता. इस गली के
एक छोर पर कोई १० मीटर के बाद ही एक मकान में मास्टर शिव शंकर तिवारी रहते थे
जिन्होंने उन्हें इंटर तक अंग्रेज़ी और संस्कृत पढाई थी. मास्टर जी की दिनचर्या बड़ी
सात्विक थी, स्कूल से लौटते ही आधा घंटे के बाद उनका ट्यूशन का कारोबार परवान चढ़ता.
एक के बाद एक बैच रात के आठ बजे तक चलता. सुबह स्कूल जाने के समय से पहले भी वह दो
बैच पढ़ा चुके होते. दिनभर के इतने व्यस्त कार्यक्रम के बाद रात नौ बजे तक तो वह इतनी गहरी नीद में होते कि उनकी खर्राटे
दरवाजे तक सुनायी पड़ते. ऐसे गरजदार माहौल में कोई कुत्ता भी गली के उस इलाके में
सोना पसंद नहीं करता.
उन दोनों दोस्तों
को मास्टर शिव शंकर से कुछ ज्यादा ही लगाव था. एक दिन रात के करीब ग्यारह बजे उन्हें
इस गली से गुजरते हुए खर्राटों की भयानक
आवाज़ ने कक्षा आठ से कक्षा १२ तक का इतिहास साक्षात सामने लाकर पटक दिया. उनके
शैतानी दिमाग ने तुरत फुरत प्रतिक्रिया करनी ही थी. दरवाज़े के पास जाकर उनमे से एक
ने गले का गियर बदल कर आवाज़ लगाई “बेटा शिव शंकर” और इससे पहले कि कोई नतीजा सामने
आये दोनों फर्राटा लगा कर गली के उस घुप्प अँधेरे में किसी प्रेत की तरह समा गए.
दो तीन दिन यह
सिलसिला चला, उस दिन बड़े अनमने मन से उसने रात के उसी पहर में आवाज़ लगाई, ‘बेटा
शिव शंकर” दरवाज़े के उस तरफ से फ़ौरन जवाब मिला ‘जी पिता जी, अभी आता हूँ”. अभी आता
हूँ के साथ लाठिया के सिरे में लगे लोहे के कैप की फर्श पर पटकने की आवाज़ साफ़
सुनाई पडी. आदतन उन दोनों के मद्धम पड़ते साए बिजली की सी तेज़ी के साथ अँधेरे में
समा चुके थे. आज उन्हें अपनी मुसलसल मेहनत का नतीजा पहली बार मिला था, वे दोनों
बड़े खुश थे.
अब वे दोनों भी
सयाने हो गए थे, दो दिन के अंतराल के बाद रात के उसी पहर में उन्होंने फिर वही
हरकत की, अबकी बार ‘अभी आया हरामजादे’ के जवाब के साथ दरवाज़ा फौरन खुलने की आवाज़
भी साथ हुई. मास्टर जी पूरी तैय्यारी के साथ चौकस पहरे पर बैठे थे. अब उन्होंने
दरवाज़ा खोल कर ट्यूशन पढाना शुरू कर दिया था ताकि गली से हर आने जाने वाले पर नज़र
रख सकें. अब देर रात तक मास्टर जी की बैठक में ट्यूब लाईट जलने लगी थी, शनिवार की
रात तो अभूतपूर्व रूप से ग्यारह बारह बजे तक मास्टर जी की बैठक का दरवाज़ा खुला
रहता और आने जाने वाले को उनका गणेशी रूप स्पष्ट दिखता.
गुरु जी नमस्ते,
एक रात उन दोनों ने मास्टर जी के दरवाजे से गुजरते हुए एक स्वर में प्रणाम किया. ‘नमस्ते
बेटे’, मास्टर जी ने दोनों के चेहरों को पहचानने की मुद्रा में फ़ौरन जवाब दिया.
‘गुरु जी कैसे
इतनी रात तक ...? अभी सवाल पूरा भी नहीं हुआ था
‘कुछ नहीं, कोई
आने वाला है उसकी इंतज़ार में हूँ’.
‘लेकिन ये लाठी’?
“बेटे, कुत्ते
बहुत हो गए है गली में”
लेकिन तुम लोग
इतनी रात यहाँ कैसे ? मास्टर जी ने सवाल दाग़ दिया.
“गुरु जी, दादा
जी की तबियत खराब है उनकी दवाई लेने गया था”
‘ओह, समझा’ ..
मास्टर जी का जवाब
सुनकर दोनों आगे बढ़ गए और गली पार करते ही एक दूसरे को देख कर जोर जोर हंसने लगे.
रचनाकाल : जनवरी
१२,२०१५
स्कैच साभार:
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