Saturday, June 1, 2013

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १२ - एक थे भाई

 भाई हमीद, किसी जमाने में उनकी अपने हवेली नुमा मकान पर पूरी हकूमत हुआ करती थी. जब मकान के  सभी कमरों में उनके लडके बस गए तो उनकी मशहरी दालान में आ गयी. जब दालान में उनके लड़कों  के बच्चों  का शोर बढ़ने लगा तो उनकी  चारपाई बाहर बैठक में आ गयी. जब बैठक में उनके लड़को के व्यापारी  दोस्त आने-जाने लगे तब, उनकी खाट मकान के दरवाजे पर आ गयी. भाई की घरवाली को गुज़रे एक अरसा हो चुका था. चार बेटो के चार चूल्हों से कुछ न कुछ कोई न कोई उन्हें दे ही देता.  उम्र के  अब इस दौर में पहुँच कर  उनके नाम से हमीद गायब हो चुका था, बस अब नाम के नाम पर जो लफ्ज़ बचा था, वह था भाई. घर के बाहर के सभी लोग उन्हें भाई कह कर ही बुलाते. खैर पूरी गर्मियों में भाई की खाट दरवाजे के बाहर होती. दोपहरी में वह बैठक में होते शाम और रात को फिर उनका बाकी वक्त उसी खाट पर घर के बाहर कटता.

भाई की खाट मुहल्ले, पास पडौस के लड़को का एक छोटा मोटा अड्डा बन गया था. कोई आता जाता तो भाई से पूछता कि रफीक आया था क्या ? रफीक आता तो भाई से पूछता शमीम आया था क्या ? शमीम आता तो वहीद के बारे में पूछता. भाई का मूड ठीक होता तो जवाब दे देते वर्ना गाली देकर कहते..तेरे बाप का नौकर हूँ मैं ? अबे मुझे डाकिया समझ लिया क्या ? खैर भाई जब ज्यादा गुस्से में होते तो कोई भी एक बीडी जलाता और उनके हाथ में थमा देता, भाई को थोड़ा सकूं हो जाता. उम्र के जिस ढलानदार पुल पर  भाई खड़े थे वहां एक-एक करके बहुत सी चीजे उनका साथ छोड़ रही थी, जैसे सर के लगभग सारे बाल गायब हो चुके थे, यहाँ तक की कि उनके  गालों  तक पर कोई बाल न आता. ले दे कर ठुड्डी पर चार पांच बाल आते जिन्हें वह खुद  कुतर लिया  करते. मुंह के भीतर  अब एक भी दांत नहीं बचा था, सब झड चुके थे. सो चबाने का डिपार्टमेंट एक मुद्दत से बंद  था. एक कान से सुनाई देता दूसरे से नहीं. जाने क्यों ...उनकी नज़र ठीक थी कि सबके चहरे पहचान लेते.

गुजरते वक्त और हालत ने मानो  सारा हिसाब उनकी चेहरे की झुर्रियो में रकम कर दिया हो. चेहरे पर इतनी झुर्रियां थी जैसे किसी नाराज़ बच्चे को होम वर्क करने के लिए कहे और वह अपनी कापी को बेतरतीब कीरम कांटियों से भर दे. ऊपर से रंग उनका काला, अब आप समझ ही सकते है कि जिस मंज़र का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ वह कश्मीर से कितना मिलता जुलता होगा ? गुजरती उम्र ने भाई की तुनक मिजाजी में हर साल इजाफा ही किया. उनके आस-पास रहने वालो और रिश्तेदारों  का यही कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में  मंहगाई और भाई के गुस्से में कभी गिरावट नहीं देखी. चाहे कोई भी सरकार हो ..नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव तक ने, ‘दोनों’ को हमेशा बढ़ाया ही, घटाया कभी नहीं.

भाई सलाम, रफीक ने भाई को दूर से सलाम किया और उनकी पायेंती आकर बैठ गया. भाई सरक कर खाट के सिरहाने हुए.

‘शमीम नहीं आया अभी या आ के चला गया’ ? रफ़ीक ने एक साँस में दो सवाल पूछ लिए.

‘मुझे न पता, मैं उसके या तेरे पीछे रहूँ’ ? भाई ने जला भुना जवाब देते हुए कहा.

‘बडे नाराज हो रहे हो भाई, रोटी नहीं मिली अभी तक शायद’....रफीक की बात अभी पूरी भी नहीं हुई कि भाई बरस पड़े.

‘अबे ओ भूखे खानदान के रईसजादे, मुझे क्यों न मिलती रोटी, शलजम गोश्त खा के बैठा अभी, तेरी तरह न की हांडता फिरूं गली गली’.

‘ओय होय, आज तो शलजम गोश्त मिल गए, क्या बात है? तभी कलफ लग रहा है जुबां पर’ ....रफीक की बात पूरी भी नहीं हुई कि शमीम वहां आ गया.

‘अबे क्यों छेड़ रहा है भाई को’ ...बीच बचाव करते हुए शमीम बोला.

‘मुझे ने छेड़ रहा कोई, इसे ले जा यहाँ से मेरे कान खा रहा है’....भाई ने शमीम को जवाब दिया.

शमीम ने कुल्फी वाले को आवाज लगाई, एक खोये वाली कुल्फी भाई के लिए मंगवाई. भाई ने कुल्फी खाई और शमीम  को खाट पर बैठा लिया. शाम ढल चुकी थी. अब आधी रात तक शमीम की जगह भाई की खाट पर  पक्की हो चुकी थी.

रफीक झटके के साथ खाट से उठा और अपने चूतड़ों पर खुजाते हुए बोला ‘भाई की खाट के खटमलो को बस मेरा ही खून चाहिए, भाई के पास तो अब कुछ बचा नहीं उनके लिए, बस मेरे आते ही उनकी दावत हो जाती है’

भाई को बहलाने  के लिए सबसे अच्छा तरीका था भाई के जवानी के दिनों की चर्चा को शुरू करना, जिसका आगाज़ अक्सर  क़स्बे के किसी पुराने रईस के घर खानदान का नाम उछाल कर आसानी से किया जा सकता था. फिर क्या ..भाई शुरू हो जाते और जाने किस किस की पुलिए खोलते ..साथ साथ वह अपनी काली घोडी के किस्से बताते जिसकी  तीन पुश्ते उनके यहाँ पली ..जिसकी पीठ पर बैठ कर आस पास के गाँवों में भाई  व्यापार करने जाते थे. अब तक कोई दो घंटे हो चुके थे रफीक और शमीम ने भाई से उनकी घोडी और जवानी का जिक्र करके जो शानदार मूड और फिज़ा बनायी थी कि रफीक के ‘खटमल काण्ड’ ने भाई को उनकी जवानी वाले दिनों के नास्टोलजिया से एकदम तपते हुए यथार्थ पर पटक दिया. भाई तिलमिला गए और गाली देते हुए अपनी लाठी उठायी और दोनों को खदेड़ते हुए बोले...’चलो भागो  यहाँ से, कमीनो....खटमल होरे यहाँ...अबे खटमलो के गूदड़ो में पैदा हुए तुम ..मेरी खाट में खटमल बता रहे हो...चलो भागो यहाँ से, दफा हो’

शमीम को लगा कि रफीक ने मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ कर दिया है, अब भाई बिगड़ चुके है. लाठी भी उठ चुकी है. भाई को बिगड़ते देख दो चार राहगीर तफ़रीह के लिए फौरन जमा हो गए और रफीक, शमीम को कोसने लगे. माहौल की नज़ाकत को दोनों ने समझा और मौके से खिसक लिए.

थोड़ी देर बाद, रात और गहरी हो चुकी थी ..आस पास की सभी दुकाने बंद हो चुकी थी. क़स्बे  के दूसरे कौनो में अपने खोमचे-ठेली  लगाने वाले भी सुस्ताते-सुस्ताते अपने-अपने घरो के तरफ रवाना हो चुके थे. एक हाथ में पंखा झलते भाई अपनी खाट पर औंधे मुंह लेते हुए थे कि आवाज आयी.

‘भाई सोये नहीं अभी? आज गर्मी बहुत है लो सिगरेट पी लो ..नींद आ जायेगी’

भाई को नींद कहाँ आ रही थी, वह अलसाते हुए बैठे कि रफीक ने उनकी उंगलियों में सिगरेट फंसा दी. सामने फिर रफीक और शमीम  को भाई ने सख्त निगाहों  से देखा और फिर अपनी उंगली में सुलगती हुई सिगरेट को देखा ..सिगरेट ने अपना रूतबा दिखा कर बाजी मारी.नफ़रत और गुस्से को गिराते हुए वह उठी और पोपले होठों में जाकर घंस गयी ..जिसके एक सिरे से हवा अन्दर की तरफ सरकी तो दूसरे सिरे पर शोला कुछ और सुर्ख रूह हुआ. ये सिलसिला अभी दो चार बार ही हुआ था कि भाई खाट  पर सीधे लेट गए. रफीक ने बाकी बची हुई सिगरेट उनकी ऊँगलियों से निकाली और शमीम के साथ उठ कर, एक गहरा कश लगाते हुए चल दिया.

बेशुमार मक्खियों मच्छरों की भिनभिनाहट, कान, आँख, नाक, मूँह में उनकी अनचाही दखलअंदाजी के चलते भाई की जब आँख खुली तो उनकी पहली निगाह आसमान में गयी. गौर से देखा तो पाया कि यह आसमान का वह हिस्सा नहीं जिसके दर्शन उन्हें हर रोज़ होते थे, ये कुछ अलग है ..दाहिनी तरफ करवट पलट कर देखा तो लाला बसंती की कपड़ो की दुकान गायब थी, दूसरी तरफ पलट कर देखा तो उनके घर का दरवाज़ा गायब. अब तक उन्हें अपनी लोकेशन बदली होने पूरा यकीन हो चुका था.

भाई ने जैसे ही अपनी खाट छोड़ने के लिए पाँव ज़मीन पर रखने की कोशिश की तो नीचे का नज़ारा भी बदल हुआ था. उनकी खाट मौहल्ले की उस कूड़ी पर थी जिसे सफाई कर्मी हफ्ते में सिर्फ एक दिन साफ़ करते. नाली की कीचड़, सब्जी मंडी का कचरा, मौहल्ले वालो की गंद और आस पास के दुकानदारों का कबाड़ा इसी कूड़ी पर सड़ता रहता जिसमे दिन चढ़ते ही सूअर आ जाते और दिन भर वही लोट मारते. भाई ने देखा उसकी चप्पले भी कीचड़ पर रखी है जो कुछ जम चुकी थी. भाई ने अपनी चप्पलो को झुक कर हाथ से उठाने की कोशिश की. घिसी हुई चप्पले  कीचड़ से चिपक चुकी  थी. भाई ने थोड़ी सी ताकत के साथ उन्हें उठाया तो छपाक से वह उनके हाथ में आयी जरुर लेकिन कीचड़ ने अपना काम किया. कुछ वजनदार कीचड़ की छींटे सीधे भाई के मुँह पर आ बैठी, बस फिर क्या ..भाई ने बिना किसी सूचना के जो हाय तौबा; रोना पीटना और गालियों का कार्यक्रम सुबह-सुबह शुरू किया, उससे आस पास के कई घरो में सवेरा वक्त से पहले हो गया. जल्दी ही उनकी खाट और कूड़ी के इर्द गिर्द लोगों की भीड़ इकट्ठी ही गयी, कुछ हंस रहे थे  तो कुछ गालियाँ दे रहे थे. बारहाल  भाई की खाट को भाई सहित बड़ी हील हुज्जतों के साथ मौहल्ले वालो ने कूड़ी से बाहर निकाला.

पीपल के पेड़ के पीछे खड़े शमीम और रफीक दूर से यह नज़ारा देख कर जोर-जोर से हंस-हंस कर दुहरे हुए जा रहे थे. दंभ से भरे रफीक ने कहा, ‘देखा सिगरेट का कमाल...’

‘हाँ माल अच्छा था’....शमीम ने जवाब दिया, दोनों तेज़ी से  अपने अपने घरो की तरफ लपक लिए.

रचनाकाल : जून १,२०१३ 
फोटो सौजन्य : गूगल