Monday, May 20, 2013

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से- भाग ११- मकैनिक महबूब



मौजूदा पागल महबूब की ज़िंदगी को दो हिस्सों में तकसीम करके देखा जाए तो अच्छा. उसके पागल होने से पहले और पागल होने के बाद. वजह, क्योकि वह पैदाइशी पागल नहीं है. और वह पागल है भी या नहीं यह  किसे मालूम? किसी के पास इसका कोई पुख्ता सबूत तो है  नहीं कि वह सचमुच में पागल ही है. लेकिन समाज का अपना गति विज्ञान है उसके अपने नियम है, कोई उसकी गली में जाकर किसी बच्चे से भी पूछे कि महबूब का घर कौन सा है तो पहले कहेगा ..’वो पागल महबूब’?

पागल होने से पहले, मेरा मतलब महबूब जब ठीक ठाक था, नौजवान था और नौजवानों कि तरह उसका दिल मचलता था, हँसता, गाता, लड़कियों के साथ रोमांस करता, शायरी करता था- उन दिनों वह एक साधारण  नौजवान की सारी खूबियों से लैस था. पहले वह साईकिल चलाता था, बहुत तेज़, फिर मोटर साईकिल चलाता था वह भी बहुत तेज़, यहाँ तक की वह जब  ट्रैक्टर भी  चलाता था तो अपने अलग ही अंदाज़ में..उसकी तेज़ी को देख कर समाज ने उन दिनों उसे एक अलग नाम दे रखा था ‘चील’. साइकिल-मोटर साइकिल चलाते वक्त उसके सख्त घुंघराले बाल भी उड़ते थे, जिन्हें देख कर किसी खुराफ़ाती दिमाग ने उसका नाम ‘चील’ रख दिया था.

हुआ यूं कि जब आवारा फिरते उसे एक अर्सा हो गया तब उसके वालिद ने उसे कोई काम धंधा  करने की सलाह दी. सो उसने पहले वही काम सीखने का निर्णय लिया  जिसका उसे शौक था. मोटर साईकिल; वह भी बुलेट मोटर साईकिल,  उसका काम क़स्बे  के एक नामवर मिस्त्री से सीखा और फिर अपनी  दुकान खोल ली. उसकी दुकान खूब चलती. आस पास के जाट-गूजर काश्तकारों के  गाँवों में उसकी जान पहचान पहले से थी जिसने  उसका काम आसान कर दिया. बस फिर क्या जो भी मोटर साईकिल ठीक होने के लिए आये; तो एक बार ठीक करने से पहले और एक बार ठीक करने के बाद, वह बुलेट पर सवार होकर क़स्बे के बीचो बीच ‘ट्राई’ के लिए जाता. रास्ते में पान की दुकान से पान भी  खाता. दिन भर में  १०-२० बार उसका यह ‘ट्राई’ अभियान होता ही, सो उसका  नाम ‘चील’ पड़ना, इक तरीके से मुनासिब ही था.

एक दिन महबूब एक बुलेट का इंजन खोले बैठा था, अब मोटर साईकिल के फ्रेम में बस गद्दी अटकी हुई थी बीच का माल महबूब खोल कर साफ़ सूफ कर रहा था. इसी मोटर साईकिल की गद्दी पर कमर झुका कर बुलेट का मालिक महबूब को काम करते करते देख रहा था कि महबूब ने बड़ी जोर से रिहा खारिज की. बेसाख्ता महबूब और गाडी के मालिक की नज़र आपस में टकराई जिसने महबूब के चेहरे पर अजीब सी शैतानी मुस्कान ने उसकी मूछों के नीचे होठों को खींच लम्बा कर दिया था अभी उसके नुमायशी दांत बाहर ही निकले थे कि मोटर साईकिल का मालिक चौधरी बोला-

‘लाल्ला, जा तेरी उंगली पे लग रा, तनक नीच्चे भी लगा ले. सुक्खी रैंक री’

जाट के इस तुरत बुद्धि जनित वाक्य को सुनकर महबूब की  निगाह अपनी उँगलियों पर लगे ग्रीस पर जम गयी और उसका  मुंह खुला का खुला रहा गया. इस नज़ारे को देख कर उसके पास काम सीख रहे चेले चपाटे  लड़को की हंसी छूट पडी. फिर क्या चौधरी साहब, महबूब और उसके चेले जोर-जोर से खूब देर तक हँसते रहे...
रचना काल: मई १६,२०१३   
फोटो सौजन्य : गूगल  

Wednesday, May 15, 2013

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग १० - किस्सा हाजी मक़बूल



सरदारों से संबंधित चुटकुलों से दुनिया वाकिफ है लेकिन, मेरे क़स्बे के हलवाई समुदाय के किस्से भी कुछ कम नहीं. मुस्लिम हलवाई बिरादरी एक मेहनतकश तबका है, जिसमे काम धंधे  को बड़ी तर्जी  दी जाती है. लडके की अगर अपनी दुकान  हो तो रिश्ते अच्छी जगह हो जाते, उनकी शादियाँ अच्छी हो जाती. लिहाज़ा हर बाप का यही काम होता, थोडा बहुत बच्चो को पढ़ा कर या तो कोई काम सिखवा देते ताकि एक दो साल में वह अपनी दुकान खोल सके या किसी रोजगार में लगा देते. लडके की अपनी दुकान, कारोबार या ठिय्या जैसे उसकी शादी की पूर्व प्राथमिकता हो. इसे पूरा किये  बगैर शादी का होना मुश्किल, शादी हो और वह अच्छी न हो तो उसका न होना ही अच्छा. अच्छी से मतलब सुन्दर लड़की जो अपने साथ ख़ूब माल लाये; इतना कि घर भर जाए, जिसकी नुमायश मौहल्ले में लगाई जाए ताकि बिरादरी और समाज को बताया जा सके कि फलां फलां के लडके की शादी में इतना दहेज़ मिला, इतना नकद, इतना जेवर,इतने जोड़ी कपडे  वगैराह-वगैराह ...अब बताने वाले हमेशा एक के दो कर ही दिया करते..यह रिवायत भी है, और दस्तूर भी. वो लोग तो बड़े ही खुशी के साथ इन बातों का महीनो जिक्र करते जिन्हें लडके की बारात में जाने का और वलीमे की दावत खाने का एजाज़ हासिल हो..

खैर; हाजी मकबूल, अपने इन सभी कामों से फारिग हो चुके थे. कोई आधा दर्जन बच्चो की शादी कर चुके थे और समाज में उनका रुतबा भी था. किसी को उनके मैले कपड़ो से कोई लेना देना नहीं था, वे सबसे इज्जत पाते. दिन भर  अपनी खांड की दुकान पर व्यस्त रहते. उनका बनाया हुआ बूरा बहुत बिकता था, आस पास के गाँवों  में उनकी खांड और बूरे की अच्छी खासी साख थी.

सर्दियों की एक सुस्त सुबह के दिन क़स्बे के प्रसिद्द डाक्टर बशीर के घर के दरवाजे पर आवाज लगी, ‘डाक्टर साहब, डाक्टर साहब”

दो चार आवाजों के बाद जब किसी के जागने की कोई हरकत न हुई, तब दरवाजे की कुण्डी बजाने के साथ यह आवाज दो तीन बार फिर दोहराई गयी. गर्मियों के दिनों में इतनी आवाज पर कुत्तो की पूरी टोली भोंकती हुई दौड़ पड़ती लेकिन कुत्ते भी दिसंबर की सर्दी में अपने-अपने कोपचों में अलसाए पड़े रहते. किसी को ज्यादा ही देशभक्ती सूझती तो बैठे-बैठे ही एक दो बार भू-भों करके या अलसाई आवाज़ में घुर्रा कर चुप हो जाता. और अगर खड़का करने वाले के हाथ में लाठी हो, तब वह अपने जज़्बाती फ़र्ज़ से मुंह चुराने में ही अपनी भलाई समझता.

‘कौन है’....दरवाज़े के ठीक सामने बनी दुकडिया से एक सपाट सी आवाज सुनकर कर हाजी मकबूल ने अपना नाम बताया. जिसे सुनकर फिर जो जवाब आया उसे सुनकर हाजी जी को तसल्ली हुई कि जैसे उनकी पहचान हो गयी हो. कम्बल में अध लिपटा एक साढ़े पांच फिट का बदन पलंग छोड़ कर दरवाजे की तरफ बढ़ा और दरवाजा खोलते हुए ही समाने हाजी मकबूल को देख कर सलाम करते हुए खैरियत पूछी.

‘लाल्ला क्या बताऊँ, मुझे कोई दवाई दे दे रात भर मेरी दाड कूलती रही, मैंने सोचा कि क्यों रात में तुझे तकलीफ दूं सो फजिर की नमाज पढ़ते ही सीधा तेरे पास आ गया, कसम खुदा की रात भर मछली की तरफ तड़पा हूँ. जो एक मिनट कू भी आँख लगी हो’

दाढी खुजाते हुए अभी हाजी जी ने अपनी पूरी बात भी नहीं की कि असद ने बात काटते हुए कहा, चलो आप बैठो चल कर मैं चाबी लेकर आ रहा हूँ. असद डाक्टर बशीर का छोटा भाई है इस दुकडिया में सोने का शर्फ़ उसे ही हासिल होता था जो डा. बशीर की क्लीनिक पर उनका असिस्टेंट बने. आजकल बशीर साहब के सबसे छोटे भाई का नंबर यहाँ सोने का है इससे पहले उनके तीन भाईयो ने इसी तरह ड्यूटी की, बारी-बारी  काम सीखा और इधर-उधर अपने-अपने दवाखाने खोल कर डाक्टर बन चुके थे.

थोड़ी देर बाद असद ने मतब खोल कर हाजी मकबूल की बीमार दाड का मुआयना किया और एक पुडिया के साथ एक परचा  देते हुए कहा ‘हाजी जी, आपकी दाड का इलाज बस एक बचा है, वो है जम्बूड... ये परचा डाक्टर रमेश-दातों वाले के लिए मैंने लिख दिया है, दोपहर तक उसके पास चले जाना. तब तक ये दवा नाश्ते के बाद खा लेना, फौरी आराम हो जाएगा, लेकिन असली आराम इसे उखड़वा कर ही मिलेगा, ईमान से- बिल्कुल गली पडी है, कीड़ा जड़ तक पहुच गया इसी लिए आपको सारी रात तकलीफ हुई.

‘अच्छा जी” ... सहमी हुई आवाज़ में हाजी मकबूल ने जवाब दिया, ‘डाक्टर रमेश? असद ने कहा, ‘आप जानते नहीं बडे  गाँव वाले डाक्टर रमेश, अनाज मंडी के गेट के बाजू में...’

‘हाँ-हाँ समझ गया’....हाजी मकबूल पैसे देकर पुडिया और परचे के साथ रुखसत हुए.

मरीजों से फुर्सत की घड़ी में, ढलती हुई  दोपहर में क्लीनिक के बाहर चबूतरे पर धूप सेंकते, अखबार पढ़ते हुए असद की नज़र हाजी मकबूल पर पड़ी जो तेज़ी के साथ अपने मुकाम की तरफ जा रहे थे. असद ने जोर से आवाज़ लगाई ..;हाजी जी’, पलट कर हाजी मकबूल ने असद को देखा और पास आकर बैंच पर बैठ गए.

क्या हुआ, हो आये डाक्टर के पास से? असद ने तहकीकात करते हुए पूछा.

‘अजी मैं न गया उसके पास, उसने तो अपनी फीस का इत्ता बड़ा बोर्ड बाहर ही लगा रखा, २० रु० ....मैं तो उसे देख के झब्बर मंडी चला गया, जहां घोड़ों की नाल लगें, उसके बराबर में ही दांत वाला भी बैठा रह...पांच रु० दिए मैंने तो, एक मिनट भी न लगा उसे तो, फ़ौरन उखाड़ दी उसने’...

असद ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘दिखाओ ज़रा देख तो लूं क्या किया उसने’ ?

हाजी ने मुंह फाड़ कर मुआयना कराया, ‘ये क्या करवा लाये? दर्द तो ऊपर वाली दाड में था, उसने उखाड़ दी नीचे वाली”

‘अजी नहीं, ऊपर वाली तो ठीक है अब, ये नीचे वाली ही तो जा-जा के लगती थी उसमे, इसलिए  मैंने इसे ही उखड़वा दी’ हाजी मकबूल ने सफाई दी.

हाजी मकबूल की बात सुनकर चबूतरे पर बैठे लोग अपनी हंसी न रोक सके.

असद जल्दी से दवाखाने में गया और एक पुडिया हाजी मकबूल को देते हुए बोला ‘सुनियो, ये रात को सोने से पहले खा लेना’

हाजी मकबूल के जाते ही उनके दूसरे किस्सों में यह एक यह किस्सा जुड़ चुका था, जिनका जिक्र करते हुए लोग बहुत देर तक जोर-जोर से हंसते रहे. असद ने बताया, ‘भईया मैंने तो अपना इंतज़ाम कर लिया उसे पुडिया देकर, वर्ना रात को कुंडी आज जरुर बजती......आज फजिर के टाईम से ही जागा हुआ हूँ’

रचनाकाल: मई १५,२०१३