Tuesday, December 25, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ९- माहे रमज़ान और बुलाकी

माहे रमज़ान में उसे अपने जेल खाना नुमा मकान से दो घंटो की छूट घर से मस्जिद जाने के लिये मिलती थी, इशा की नमाज़ के वक्त तरावी जो होती वो बड़ी देर तक होती। खुतबा, दुआ, इबादत के जोड़ घटा के साथ दो घंटे उसे जी लेने के लिए काफी थे। उसके साथ के हमजोली भी पूरे महीने उसी मस्जिद में मिलते मानो मस्जिद न हुई कोई अड्डा हो। मस्जिद के इमाम उसके वालिद का एहतराम करते सो वह उनकी नज़रों से किसी थम के पीछे छिप कर मस्जिद में बैठता।
उस दिन रमज़ान का पहला जुमा था। मस्जिद नमाज़ियों से वक्त से पहले ही भर गयी थी। जमात खडी होने तक एक सफ में तकरीबन दो-दो कतारें बैठ चुकी थी। तभी हाशिम थम के पीछे बैठे आबिद के पास बैठते धीरे से हुए बोला, 'आज बड़ी भीड़ है, अल्लाह ही जाने आज क्या हो'? आबिद ने किसी अनजाने खतरे की वजाहत करते हुए हाशिम से फुसफुसाते हुए पूछा,'क्यों सब कुछ ठीक तो है तूने इतनी देर कहाँ कर दी'?
'इतनी भीड़ में शिकार नहीं आयेगा' ...रुक कर फिर बोला, 'घर से निकलने में देर हो गयी थी'। आबिद ने जबाब सुनते ही कहा आज बिजली भी नहीं है शिकार को जरुर आना चाहिये। लैम्प और मोमबत्तियों की मंद-मंद रोशनी में आबिद ने उचक कर नमाज़ियो को वहाँ तक देखा जहाँ तक उसकी आँखे इसकी इज़ाज़त दे सकती। हाशिम मस्जिद की दूसरी दिशा में देखने लगा। आबिद ने पूछा 'दिखाई दिया' ? 'नहीं, मेरे ख्याल से वो अभी नहीं आया' हाशिम ने जवाब दिया।
बारहाल वक्त हो चुका सो अज़ान के बाद जमात खड़ी हो गयी उन दोनों को उनका शिकार न दिखाई पड़ा। दूसरी रकत का अभी सजदा ही हुआ था कि मस्जिद की पिछ्ली कतारों से माँ-बहन की गालियाँ देने की भारी बुलबुली आवाज़ ने इमाम साहब की आवाज़ को चुनौती दे दी। उसकी फाहशी गालियों को सुनकर कम उम्र के लडके खी-खी कर के बंदरों की तरह नियत बाँधे-बाँधे मस्जिद में हँसते रहे। ये एक नीम पागल था जिसका नाम बुलाकी था। पक्का रंग, छोटा कद समाने के दाँत गायब और चेहरे पर चीनी दाढ़ी जो ठुड्डी से आगे कभी बढ़ी ही न थी। साल में एक दो बार उसे उसके घर वाले पकड़ कर नहला देते। उसके कपडे किसी तप्पड से कम नहीं, बस एक कुर्ता नीचे तहमद जैसे इन्होने जिद कर ली हो कि मरते दम तक वे बुलाकी का साथ न छोडेगें। उसकी आवाज़ बहुत भारी थी, मुहँ में सामने के दाँतों का दरवाज़ा गायब होने से गले से निकले लफ्ज़, लफ्ज़ बनने से पहले ही हवा के गुब्बारे बनकर ब्रहमाण्ड में विलीन हो जाते। लिहाज़ा जब बुलाकी बोलता तो हो हो की आवाज़ अधिक होती लेकिन कयोंकि लोग अभ्यस्त हो चुके थे इसलिए वह उसकी बात समझ लेते थे। जिसे जब उचंग उठती वो बुलाकी को छेड़ लेता और उसका रेडियो स्टेशन एक ही रिकार्ड प्ले करता, वो बस माँ की गाली देता। दूसरे ही पल छेड़ने वाले को अगर बुलाकी से दोस्ती करनी हो तो एक बीड़ी पिलानी होती, बीड़ी देखते ही बुलाकी का गुस्सा गायब। उसके शैदाई मस्जिद में भी उसका पीछा न छोडते, मौका मिलते ही कोई ने कोई उसे छेड़ लेता और बुलाकी का रिकार्ड बिना परवाह किये बजने लगता।
सलाम फेरते ही मस्जिद का इन्तज़ामिया खड़ा होकर शरारत करने वालो को फटकार पिलाता, उन्हें अल्लाह के घर में अल्लाह से डराने की कोशिश करता। उसकी हाँ में हाँ चमड़े वाला बशीर सबसे पहले उठ कर मिलाता। बशीर से ही बुलाकी सबसे ज़्यादा डरता क्योंकि वह भी उसे सताने में माहिर था।
सुन्नत पढ़ते ही हाशिम और आबिद मस्जिद की पिछली सफ में आ गये। तब तक बुलाकी पहला झटका लगते ही इमाम साहब के बिल्कुल पीछे अपनी नमाज पढ़ने जा चुका था। अभी आधी तराबी भी पूरी न हुई थी कि हाशिम ने आबिद को खबर दी कि रहीम आढ़ती के नजमु ने बुलाकी के ऊँगली उस वक्त कर दी थी जब वह सजदे में था। तीन दिन पहले नजमु के भाई हसरत ने बुलाकी के सजदे में जाते ही अण्डे पकड़ लिये थे जिस पर बुलाकी ने कायदे का बवाल काटा था। आबिद और हाशिम को एक दिन और निराश होना पड़ा क्योंकि उनका शिकार हर बार उनसे बड़ा कोई और शिकारी शिकार कर लेता।

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रचनाकाल : दिसंबर 16,2012

फोटो सौजन्य : गूगल

Sunday, December 16, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ८- एक था समर


समर भाई अपने बाप के इकलौते बेटे थे, वालिद के फौत होने पर पिता का हिस्सा डायरेक्ट उनके खाते में आ गया था, कस्बे के बीचों बीच एक कतार में पांच दुकानें उसके ऊपर रहने के लिए कायदे का मकान, किराए की माकूल आमदनी, यानी बिगड़ने के लिए जितने बाहरी कारक जीवन को चाहिए थे वो सब उनके पास मौजूद। शाम होते ही उनका मुँह किसी तेज़ाबी गंध से महकता, फिर वे सीढियों से उतर कर सलीम पनवाड़ी से पान खाने पहुँच जाते। दिनभर ताश खेलना शाम को शराब,फिर देर रात तक कहीं चौकड़ी। नींद आ गयी तो सो गए और जब सो गए तो दोपहर तक कौन उठे ? समर भाई की नवाबी जिन्दगी का ज़रिया दुकानों से आने वाली किराय की आमदनी ही थी जिसे बढाने की फ़िराक़ में वो अक्सर लगे रहते, पगड़ी वसूल कर कभी नया किरायदार घुसा देना या फिर किराया बढ़ा कर। दुकानें चूंकि मुख्य बाज़ार में थी सो ग्राहकों की कमी न थी खूब चलाती, किरायेदार पैसा बनाता तो उसे किराया बढ़ने पर भी कोई ख़ास ऐतराज न होता।
समर के एक दूर के रिश्तेदार हाजी बकरा जिनका असली नाम असलम था,बकरे का गोश्त बेचने के कारण उनका समाजी नाम बकरा पड़ गया था, अपने लडके को कारोबार कराने के लिए एक दुकान की सख्त जरुरत थी लिहाजा वह पेशगी दस हजार रु समर को थमा गए और दुकान भी बता गए कि उन्हें कौन सी पसंद है। समर ने पैसा फ़ौरन संभाला और कहा की खाली कराने में जो खर्चा होगा वो तुम्हारा। हाजी बकरे ने खर्चे के नाम पर पहले सोचा फिर हाँ कर दी, एक शर्त के साथ कि ईद से पहले दुकान चाहिए। समर के पाले में गेंद फिर आ गयी .. सर खुजाते हुए बोला 'इतनी जल्दी ..ईद तो तीन महीने ही बाद है, हाजी जी खर्चा बहुत हो जायेगा, मैं ईद तक की जिम्मेदारी नहीं लेता, पर बकरा ईद तक की गारंटी, अगर ईद पर खाली हो गयी तो खर्चे के अलग दस हजार और लूँगा'।
हाजी बकरे को पसीना आ गया, माथा साफ़ करते हुए बोला 'खर्चा भी और दस अलग से, अरे अन्यायी जुलम मत कर तेरा भतीजा गुलफ़ाम काम करेगा, कुछ रहम कर दे'. समर ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, 'हाजी जी सल्लू का इनाम पच्चीस हजार नकद पगड़ी और 2000 रु महीना किराया लगा गया एक दूकान के, मैंने मना कर दिया, ये तो आप से रिश्तेदारी का मसला है कि मैंने हाँ कर दी वर्ना मुझे तो ईमान से नुकसान है इस सौद्दे में'. हाजी बकरे को इनाम के नाम पर झटका लगा , इनाम उनका मुखालिफ भी था सो फ़ौरन उनका मर्द जाग गया, 'अच्छा ये बात है, तेरा नुकसान नहीं चाहिए, मैं भी पूरे पच्चीस ही दूँगा'। बात तय हो गयी हाजी जब उठ कर जाने लगे समर ने कहा , 'हाजी जी 100 रु दे दो', हाजी बकरे ने 100 का नोट देते हुए पूछा 'ये किस मद में'? 'खर्चा आज से ही शुरू है, इंशाल्लाह ईद पर गुलफ़ाम का कारोबार शुरू हो जायेगा' समर ने खुलासा करते हुए हाजी बकरे को विदा किया।
कोई डेढ़ माह हो गया समर की परेशानी दिन बा दिन बढ़ती जा रही थी, वजह यह की हाजी बकरा को जो दुकान चाहिए थी उसमें एक लाला हरीश अपनी बिसाती की दुकान कई सालों से चलाते थे , दुकान खूब चलती समर ने लाला से कई बार बात की लेकिन लाला खाली करने के नाम पर बिदक जाये और सीधा कहे की किराया बढ़ा ले, दूकान नहीं खाली करूँगा। एक दो बार दोनों के बीच माँ- बहन की हो जाने के बाद आपसी बातचीत भी अब बंद हो गयी।
एक दिन लाला ने जब सुबह-सुबह अपनी दुकान खोली तो ताले पर मानव मल्ल के दर्शन हुए, ढूंढ़ ढांढ़ कर बड़ी मुश्किल में सफाई कर्मी हाथ लगा पांच रु देकर ताला धुलवाया फिर कही दुकान खुली। अगले दिन लाला ने दुकान खोली तब फिर वही नज़ारा देखने को मिला अब उसे समझ में आ गया कि माजरा क्या है? तीसरे दिन से लाला हरीश घर से ही पानी का लोटा साथ लेकर आने लगा। बेचारा पहले टट्टी धोये फिर दुकान खोले। अब मुसलामानो के मौहल्ले में वह सरेआम समर जैसे आदमी से न तो झगड़ा मोल लेना चाहे न दुश्मनी। घर से लोटा लाते देख उसने समर को जाहिर कर दिया कि इस तीर का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
दो दिन से एक अमरुद बेचने वाला लड़का अपनी ठेली लाला की दुकान के सामने अड़ा कर खडी करे जोर जोर से चिल्लाये 'ले जा ताजे दो रु किलो'. तीसरे दिन लाला के कान उसकी कर्कश आवाज़ से जब गूंजने लगे और उसके ग्राहक बिदकने लगे तब उसने पचास रु एक सिपाही को देकर चार डंडे ठेली वाले को लगवाये तब कहीं जाकर उसकी जान में जान आयी। लाला हरीश समर की दो गोली खा चुका था अब उसकी टेंशन बढ़ने लगी। हाजी बकरा भी एक दिन आकर उसे याद दिला गया कि हफ्ते बाद रमजान शुरू होने वाले हैं और अब तक खर्चे में ली हुई रकम के हिसाब की पर्ची भी उसे थमा गया जो तकरीबन 2600 रु की थी। समर भी हिम्मत हारने वाला नहीं था। उसने अपने बीवी बच्चों को कुछ दिन के लिए ससुराल भेज दिया और पूरे दिन हो हुल्लड़ करने के लिए तेज़ आवाज में म्यूजिक चलना शुरू कर दिया। लाला हरीश को हर रोज एक दो घूरते हुए खतरनाक चहरे दिखाई देते। हफ्ते भर चलती रही इस तरकीब का असर लाला हरीश के संकल्प को न डिगा सका, हां इस शोर शराबे से और गैर मामूली माहौल के चलते उसकी दुकानदारी अब प्रभावित होना शुरू हो चुकी थी। समर के दिमाग का पारा हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहा था। रमजान के दुसरे दिन उसने नया फार्मूला अपनाया। लाला की दुकान के ठीक ऊपर बने कमरे में भरी दोपहरी में उसने पानी भर दिया और हौज बना कर दारू पीकर उसमें लेट गया। मौहल्ले में शोर मच गया समर ने घर में हौज बना ली। लोग उसे देखने आयें, तफरीह करें और चले जाएँ। पुरानी इमारत पानी को ज्यादा बर्दाश्त कर पाने की स्थिती में नहीं थी, लिहाजा पानी रिस-रिस कर लाला की दुकान में टपकने लगा। दुकानदारी छोड़ लाला हरीश अपने माल को संभालने में लगा रहा। इतना बुरा हाल की दुकान के भीतर उसे छाता लेकर बैठने की नौबत आ गयी। उसने पुलिस भी बुलाई , समर ने कहा कि उसका मकान है, रमजान चल रहे है मुझे गर्मी लग रही है मैं अपने मकान के अन्दर हूँ किसी को क्या तकलीफ? रमज़ान की नज़ाकत देखते हुए पुलिस भी बेबस। उसी शाम को लाला हरीश ने ठेली मंगवा कर अपना सामान दुकान से हटा कर दुकान की ताली अपने पडौसी को देते हुए कहा, 'आदमी हो तो लड़ ले- लुच्चे से कौन लड़े भईय्या? ये ताली समर को भिजवा देना'
अगले दिन हाजी बकरे से पूरे बकाया पैसे लेते हुए समर ने एक कागज़ पर हाजी का अंगूठा लगवा लिया, दुकान की ताली साथ आये गुलफाम को देते हुए कहा,'ये एग्रीमेंट है एक साल का अगले साल फिर अंगूठा लगा देना, चलो काम धंधा शुरू करो। दुकान  का भाड़ा 2000 रु महीना है, महीने की दस तारीख याद रखना। लाला हरीश समर को हर महीने 1200 रु दिया करता था।
शाम को सलीम पनवाड़ी की दुकान पर समर को सल्लू का इनाम मिला , बोला 'चच्चा तुमने दुकान सस्ते में दे दी, मुझ से जिक्र करते तो मैं 2500 किराया देता और नगद पचास हजार पगड़ी, समर इनाम की कलाई पकड़ कर एक अँधेरे वाले कौने में ले गया और खड़े-खड़े बहुत देर तक बातें करता रहा।
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रचना काल= दिसंबर 16,2012
फोटो सौजन्य : गूगल