Tuesday, July 3, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ७- मेरे गुरुजन



                              (गुरुओं- आप किसी पूर्णिमा के मोहताज नहीं थे, न होंगे..!!!)

गुरु पूर्णिमा पर लोग अपने-अपने गुरुओं को याद करते हैं, मैं भी करता हूँ. कहना न होगा मेरे लगभग सारे गुरु "क्लास रुम" से बाहर वाले ही हैं. कक्षा में तो मात्र अध्यापक होता है जिसे पढाने के पैसे मिलते हैं, उनमें से एक आध कोई उत्प्रेरक का काम कर जाये तो वह गुरु वर्ना गुरु वह है जो आपको कुछ करने के लिये प्रेरित करे. उसका मात्र संसर्ग आपके जीवन में एक उत्प्रेरक बन जाये, उसके होने भर से आप किसी दिशा में खुद को बहता हुए देखे, जो भी यह कर सके, वही गुरु..मेरे लिये गुरु की यही परिभाषा है.
मैं जब छोटा था, हमारी दुकान थी साईकिलों की. स्कूल से लौटने के बाद अपना काम खत्म कर शाम होते-होते दुकान पर आना जरुरी था. दुकान और मकान में फ़ासला न था, दुकान के ऊपर मकान था. मकान-दुकान कस्बे की मुख्य सड़क के किनारे था जो खूब व्यस्त रहती थी. ठीक सामने जो गली थी उसमें उन दिनों देशी शराब का ठेका हुआ करता था. शहर के बीचो बीच आबादी वाले क्षेत्र में देशी शराब का ठेका. जिसके चलते स्वाभाविक रुप से उस गली का नाम "ठेके वाली गली" पड़ गया था. चूंकि कस्बे में ठेका एक ही था तो वह भी इकलौती गली थी, इसलिये पूरे कस्बें में अपने घर का पता बताने में कोई दिक्कत न थी, ठेके वाली गली के सामने. रोज़ शाम के वक्त उस गली में रौनक बढ़ने लगती. आसपास देहात के लोग दोपहर के बाद से ही आना शुरु हो जाते और जब वापस आते तो उनके कदमों की झूमती-बहकती गति से उनके पीने का अंदाज़ा लग जाता कि अध्धा पिया कि पव्वा..या बोतल.
रोज़ शाम को हमारी दुकान पर एक नौजवान बुलेट मोटर साईकिल पर आता. मेरे दादा या वालिद को वो अदब से सलाम-नमस्ते करता, उसकी चमचमाती काले रंग की मोटर साईकिल दुकान के एक निर्दिष्ट स्थान पर खड़ी होती और वह सीधा ठेके वाली गली में गुम हो जाता. उसके लौटने का मुझे इंतज़ार रहता. बहुत खूबसूरत, लंबा-तड़ंगा, सफ़ेद साफ़ कपडे पहनना उसका शौक, पास के गांव में एक जाट जमींदार के दो बेटों में वह बडा लडका था. उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी. बडा होने के कारण वह पढने लिखने के बावजूद कहीं नौकरी करने न जा सका था. जमींन जायदाद की रखवाली उसका पेशा बन गया था. उसका नाम अजीत सिंह था, वह ठेके वाली गली से जब लौटता तो अक्सर दो आदमियों के कंधों पर झूलता हुआ आता, लगभग बेहोश लेकिन बस अंग्रेज़ी में बडबड करता हुआ. मुझे नहीं पता कि वह क्या क्या बोलता थैंकयू, बाय बाय, गुड नाईट के अलावा वो देर देर तक अंग्रेज़ी में बोलता, जब तक उसकी मोटर साईकिल स्टार्ट करके उसके सहायक उसे बैठा न देते. उसी हालत में वह अपने गांव कोई १० किलोमीटर रात को खुद ड्राईव करके पहुँचता, घेर में उसके नौकर उसे गाडी से उतारते थे.
मुझे कदाचित उसका इंतज़ार रहता, क्योंकि मुझे उसे अंग्रेजी बोलते हुए देखने का चाव था, अजीत के चरित्र ने यकीनन मेरे बाल-ज़हन पर कोई बात रकम कर दी थी कि तुझे भी यह भाषा बोलनी है, तुझे भी यह भाषा जाननी है, लिहाजा अजीत सिंह, निवासी पिलौना तहसील मवाना जिला मेरठ मेरा पहला गुरु था. अजीत सिंह की कुछ समय के बाद मृत्यु हो गयी. मैं उसे आज नहीं, जब भी याद करता हूँ बहुत शिद्दत से करता हूँ. अपने थोडे बहुत अंग्रेज़ी के ज्ञान का श्रेय मैं अजीत सिंह को ही दूँगा न कि ठेके वाली गली में ही रहने वाले, कस्बे के सबसे अच्छे अंग्रेज़ी के अध्यापक, जो मेरे ही विद्यालय में अध्यापक थे. वह ट्यूशन भी पढाते, सुबह पांच बज़े से रात ९ बजे तक उनकी दुकान चलती. नौवीं में मैं उनसे ९ दिन और फ़िर ग्यारहवीं में ११ दिन उनसे ट्यूशन पढा, दोनों बार कोई न कोई हादिसा हुआ और उन्होंने मेरे से तौबा कर ली. पढाते समय गर्मियों में उनके बदन पर एक अदद पट्टे का कच्छा होता, उबले हुए नमक वाले आलू कटोरी भर-भर खाते रहते, गैस आती तो धडाम से बैठे-बैठे फ़ायरिंग करते, कोई हंस पडता तो उसे पीटते..बारहाल, निसंदेह वह अंग्रेज़ी के विद्वान थे लेकिन न जाने क्यूं हमारे पडौसी होते हुए भी वह मुझे प्रेरित न कर सके.
मैं जब थोडा और बडा हुआ तब मुझे पतंग उडाने का शौक हुआ, शौक भी ऐसा की जुनून की हद तक. जीवन में अभी तक एक बार ही किसी मोटर वाहन से टकराया हूँ वह भी पतंग की बदौलत. चांद तारा पतंग थी जिसे लूटने दौडा हुआ जा रहा था कि मुख्य सड़क पर कब पहुँच गया मालूम ही न हुआ. फ़ौज की जीप से टक्कर हुई, गिरा और बेहोश हो गया, आँख खुली तो खाला जान की गोद में था, पहली नज़र फ़िर आसमान पर गयी, शायद उसी चांद-तारा पतंग को देख रहा था कि कहां गयी..ये हादसा मेरी ननिहाल मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ था. उन दिनों बाय-पास नहीं बना था और वह सडक मुख्य राजमार्ग थी. खैर, हमारे कस्बे में एक व्यक्ति था जिसका नाम था खिब्बड, वह कस्बें का सबसे बडा पतंग बाज़ था. सब्ज़ी मण्डी की सरकारी दुकानों वाली छत पर वह अकेला पतंग उडाता, दो पतंग, दो चरखी लेकर एक सादी की और एक मांझे की. कोई एक डेढ़ घंटे के लिये वो पतंग उडाता और मौहल्ले भर की पतंगो का सफ़ाया करके वापस. उसकी पतंग देख कर लोग दूर से पहचान जाते कि ये खिब्बड की है, छोटे-मोटे बालक तो डर कर अपनी पतंग उतार लेते कि पहले खिब्बड अपना सफ़ाया अभियान पूरा कर ले..मैं उसे जब भी पतंग उडाते देखता तो बस मन में रहता कि पतंगबाज़ी हो तो खिब्बड जैसी, वर्ना न हो..मैंने उसकी पतंगों की चाईस, पेच लडाते हुये उसकी उंगलियों की हरकत, पतंग में ढसे डालने का तरीका आदि उसी को चुपचाप देखकर सीखा. कभी उसने बताया नहीं, कभी मैंने पूछा नहीं. उन दिनों कस्बें में पतंगबाजी की प्रतियोगिता भी होती और वह बाकायदा उसे जीतता था. फ़िर उसका विजय जुलूस कस्बे से होकर गुजरता, उसके गले में नोटों की मालायें होती. वह था खिब्बड जो केले का ठेला लगाता था, रात को दारु पीता, सिनेमा देखता, खूब ठठ्ठे मार कर हंसता तो उसके बेतरतीब मैले दांत, उसकी मैली कमीज़ मुझे यूं याद है जैसे कल की बात हो.
खिब्बड साहब को गुज़रे हुए भी एक ज़माना हुआ. मुझे फ़र्ख है कि मैं उसके नक्शे कदम पर चल कर एक कायदे का पतंगबाज़ बना, मुझे खिब्बड की पतंग काटने का भी ऐजाज़ हासिल है, लेकिन वो मेरा गुरु है, मैं बडे अकीदे से उसे सलाम अर्ज़ करता हूँ. एक और किरदार है, जिसका नाम बाड्डी है. वह खिब्बड का कम्पिटीटर था. उसकी शिफ़्त यह थी कि वो सडक पर खडे होकर ही पतंग उडाता था. उसका नाम लिये बगैर ये दास्तान अधूरी रहती, बाड्डी अभी है और मेरा दोस्त भी है, वह अब पतंग नहीं उडाता.
दर्जे ११-१२वीं तक आते आते मेरी पहचान कस्बें की कुछ काहियां निगाहों ने कर ली थी, यानि सियासी लोग ताड़ गये थे कि मुझ में कोई ऐसा कीड़ा है जो उनके ऐजेण्डे को लागू कर सके. ऐसे ही एक शख्स हैं कामरेड ज़हीर. यह वह शख्स है जिसने मेरी सोच के व्यक्तिगत होने के सपने को चकनाचूर किया. मेरे सवाल करने, नास्तिक प्रवृतियों को उन्होंने पहचाना और उसे सैद्धांतिक जामा पहनाने यानि मार्क्सवाद से अवगत कराने में उनका हाथ है. मरहूम कामरेड यूसुफ़  की चाय की दुकान उन दिनों कस्बे के सियासी लोगों का अड्डा हुआ करती थी. बस वही कामरेड ज़हीर से मुलाकात हुई और उन्होंने मुझे एस.एफ़.आई. के लोगों से संपर्क कराया. माकपा से अपने सियासी सफ़र के आग़ाज़ की कहानी उन्हीं ने शुरु करायी थी. जाहिर है ज़हीर भाई की इतिहास पर पकड़, ज़ुबान का साफ़ होना, तर्कों के जरिये भरी भीड को लाजवाब करने की कला को मैंने पहचाना था. उनके अध्ययन से मैं पहली बार मरूब हुआ, उनके किताबों के संकलन को देख कर पहली बार लगा कि मैंने कुछ पढा ही नहीं अभी तक. लिहाज़ा मेरे मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक विकास के पहले पाठ मुझे कामरेड ज़हीर से ही सीखने को मिले. सज्जाद ज़हीर, कुर्तुलएन हैदर, फ़ैज़, साहिर आदि साहित्यकारों-शायरों का नाम उन्हीं की अवैतनिक कक्षा में सुना था. उनके साथ स्थानीय राजनीतिक लोगों के साथ उठना बैठना शुरु हुआ तो मालूम हुआ कि हमारे कालिज के कई अध्यापक भाकपा से जुडे थे. हम उनके ही साथ बैठने लगे और सियासी तहरीकों में उनके साथ आना-जाना बहैसियत एक कामरेड के नाते ज़्यादा गहरा था बनिस्पत छात्र-अध्यापक जैसे रिश्ते के. कामरेड मास्टर नलुआ, शास्त्री जी, भाटी जी, कामरेड प्रीतम सिंह राठी आदि वो बुजुर्ग साथी थे जो अध्यापक भी थे और कम्युनिस्ट नेतागण भी. लिहाज़ा कामरेड ज़हीर के ज़रिये ही मेरे सियासी सफ़र और तर्क वादी चिंतन का आगाज़ हुआ, निसंदेह वह मेरे गुरु हैं और मैं पूरी ताबेदारी के साथ उन्हें आज याद करता हूँ.
पी.एच.डी. के छात्र होने तक के सफ़र में मुझे याद नहीं पडता कि मुझे मेरे किसी अध्यापक ने मुझे प्रभावित किया हो. मेरठ कालिज में डा. आर. एस. यादव (एम. एन. रायिस्ट, समाजशास्त्री) यकीनन वह शख्स थे जिनसे हम वैचारिक बहसें अथवा अपने मार्ग दर्शन के लिये उनके पास जाते थे, उनके अतिरिक्त मास्टर राजसिंह जैकरे, डा. असगर अली इंजीनियर, राम आसरे वर्मा, बुद्ध प्रिय मौर्य, कामरेड सुनीत चौपड़ा, कामरेड डा. जगपाल सिंह जे.एन.यू, कामरेड इश्वर चंद त्यागी (जो मुझे माले में लाये), कामरेड शिवकुमार मिश्र पिलखुवा वाले, कामरेड प्रभात कुमार राय, कामरेड अशोक कुमार शर्मा आदि वे व्यक्तित्व हैं जिनसे गाहे बगाहे जिंदगी में बहुत कुछ सीखने को मिला. कामरेड शिवकुमार मिश्र से अभावों के बीच खुद को बचाने की कला, कामरेड अशोक से भारत सरकार में उच्च पद पर रहते हुए भी एक नितांत इमानदार जीवन जीने और आम जनता के बारे में निष्ठापूर्वक काम करने, प्रभात भाई से परस्पर प्रेम और जीवंत संबंध बनाने के गुण निरंतर सीखने को मिले. मैं समझता हूँ इन व्यक्तित्वों के संसर्ग के बिना शायद मेरा जीवन न केवल मूल्यविहीन रहता बल्कि सूखा और नीरस भी होता. इन सभी का मुझ पर गुरुओं जैसा प्रभाव है, मैंने बहुत कुछ सीखा है और कोशिश करता हूँ कि इन्हीं की तरह और बेहतर इंसान बनूँ. मैं इस दिन इन सभी को मन की गहराईयों के साथ याद करता हूँ, उनका धन्यवाद करता हूँ, जो भी कमियां हैं वह मेरी निजी हैं लेकिन जो गुण है वो सब उन्हीं के हैं, इन सभी को तहे दिल से सलाम.
कुछ कसक भी हैं, जिन्हें मैं प्रभावित होने के बावजूद भी सीख न सका. एक हकीम थे, गन्ने की बुग्गियों पर बैठ कर आते थे ठेके की गली में घुसते और जब वापस लौटते थे तब बहुत सुरीली बांसुरी बजाते हुए निकला करते थे कि लोग खडे हो कर सुनने लगते. फ़िर कोई बुग्गी गांव की तरफ़ जाती दिखाई पडती उसी पर सवार होकर वापस..मैं उनकी बांसुरी को तब तक सुनता जब तक वो आंखों से ओझल न होते. ज़माना हुआ उन्हें भी फ़ौत हुए, उनकी बांसुरी भी चली गयी और साथ ही उनकी कहानी भी. मसूद भाई से उनके छापाखाना वाला काम, उनकी अम्मा से रुई की माफ़िक मुलायम पकौडियां बनाना, इशरत से उसकी हसौंड़ वाक पटुता, दुबई में तबरेज़ से उसकी विनम्रता, मुनीर भाई से उनका प्रोफ़ेशनल क्रिकेट, अपने बास मुल्ला से मखमली झूठ बोलने की कला न सीख पाया, कुछ जानबूझ कर, कुछ मज़बूरी में और कुछ माफ़िक हालातों के तहत. सीखना अभी जारी है, आठ दस साल के बाद यहीं से अगली कडी फ़िर लिखूंगा, जिसमें उनका हवाला भी दूंगा जो अब तक के सफ़र में रह गये या जिसने आज के बाद सीखूंगा.
रचनाकाल: जौलाई ३,२०१२

फ़ोटो: कामरेड ज़हीर कुरैशी मवाना