मुल्लाह नसरुद्दीन से मिलता जुलता एक अदद किरदार मेरे कस्बे में भी है, महबूब. अच्छा खासा था कि एक सड़क दुर्घटना में उसे सिर पर चोट लगी, वह जांबाज़ था कि बच गया लेकिन उसके बाद से उसकी हरकतें अजीबोग़रीब हो गयी थी. महबूब की जिंदगी जैसे दो हिस्सों में बँट गयी हो, एक पागल होने (यानि दुर्घटना) से पहले और एक उसके बाद..पहले जब वो ठीक-ठाक था तब जिंदगी से वह खुद मज़ाक किया करता था, अब ज़िंदगी अकसर उससे मज़ाक करती रहती है.
अब महबूब के पास कोई काम धाम तो है नहीं सो जिनके पास काम होते हैं वो महबूब को कोई भी काम दे देते जिसमें वो लगा रहता, इसी में उसकी गुजर बसर होती. कभी कभी तो वह बेगार भी करता जिसका उसे होश ही नहीं रहता.
यासीन डंगरों की ले बेच का कारोबार करता, कस्बे से लगे एक गाँव में उसे भैंस खरीदनी थी सो महबूब उसे दिखाई पडा. उसे साथ लेकर वह भैंस खरीदने गाँव जा पहुँचा, मोल-भाव हुआ पैसे दिये भैंस के साथ एक बछड़ा भी था उसे महबूब के हाथ में दे यासीन स्कूटर से कस्बे की तरफ़ स्कूटर से रवाना हो गया. दो-तीन घंटे में महबूब को भैंस-बछड़े के साथ कस्बे में आ जाना ही था, शाम ढल गयी, रात हो गयी लेकिन महबूब नहीं आया.
यासीन एक आदमी को और पीछे बैठा अहले फ़जिर गाँव की तरफ़ रवाना हुआ, रात भर उसे नींद जो नहीं आयी थी, कस्बे और गाँव के बीच में एक जंगल पड़ता जिसे लोग खोला कहते, जब यासीन खोले से गुज़र रहा था तब उसे पीछे से कोई आवाज़ सुनायी दी.यासीन ने स्कूटर घुमाया नज़र दौडायी, तब कोई सौ डेढ़ सौ गज़ की दूर पर जंगल में पेड़ के पास कोई शख़्स दिखाई दिया..स्कूटर खड़ा कर यासीन और उसका मित्र पेड़ की तरफ़ भागे, बीच रास्ते में ही यह तय हो गया था कि वह महबूब ही है जो पेड़ से अधनंगा बंधा खडा है.
नज़दीक पहुँच कर यासीन ने पाया कि महबूब पेड़ से बंधा खड़ा है साथ में बछड़ा भी बंधा है, महबूब का तहमद भी एक तरफ़ गिरा पडा है उसके चेहरे पर रात भर मच्छरों की खातिरदारी के निशान साफ़ नज़र आ रहे थे..उसके बदन पर कुर्ता इतना गंदा हो चुका था जैसे कई साल पुराना हो.
यासीन को देखते ही महबूब ने मां बहन की गालियों से उसका स्वागत किया, पेड़ से वह रात भर बँधे खड़ा था, जब वह कस्बे की तरफ़ भैंस लेकर जा रहा था तब खोले में उसे बदमाश मिले और उससे भैंस छीन कर महबूब को बछड़े के साथ पेड़ से बाँध गये थे.
यासीन ने जल्दी से महबूब को पेड़ से बाँधने वाली जेवडी खोली, खुलते ही महबूब ने पास खड़ी झाड़ियों में से एक पहणी तोड़ी और बछड़े को मोटी-मोटी गालियाँ देते हुए पीटने लगा...
यासीन ने महबूब के हाथ से जल्दी से लकड़ी छीनी. उसका तहमद झाड़ कर उसे देते हुए वजह पूछी कि माजरा क्या है.. बछड़े पर वह इतना गुस्सा क्यों हैं?
महबूब भभकते हुए बोला: "इसकी माँ की......ये साला रात भर मुझे अपनी माँ समझ कर मेरी टाँगों के बीच घुसा रहा...."
यासीन ने जब ये किस्सा कस्बें में अपने मौहल्ले की भरी चौपाल में सुनाया तब महबूब के किस्सों में एक किस्सा और शुमार हो गया.
