Tuesday, December 25, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ९- माहे रमज़ान और बुलाकी

माहे रमज़ान में उसे अपने जेल खाना नुमा मकान से दो घंटो की छूट घर से मस्जिद जाने के लिये मिलती थी, इशा की नमाज़ के वक्त तरावी जो होती वो बड़ी देर तक होती। खुतबा, दुआ, इबादत के जोड़ घटा के साथ दो घंटे उसे जी लेने के लिए काफी थे। उसके साथ के हमजोली भी पूरे महीने उसी मस्जिद में मिलते मानो मस्जिद न हुई कोई अड्डा हो। मस्जिद के इमाम उसके वालिद का एहतराम करते सो वह उनकी नज़रों से किसी थम के पीछे छिप कर मस्जिद में बैठता।
उस दिन रमज़ान का पहला जुमा था। मस्जिद नमाज़ियों से वक्त से पहले ही भर गयी थी। जमात खडी होने तक एक सफ में तकरीबन दो-दो कतारें बैठ चुकी थी। तभी हाशिम थम के पीछे बैठे आबिद के पास बैठते धीरे से हुए बोला, 'आज बड़ी भीड़ है, अल्लाह ही जाने आज क्या हो'? आबिद ने किसी अनजाने खतरे की वजाहत करते हुए हाशिम से फुसफुसाते हुए पूछा,'क्यों सब कुछ ठीक तो है तूने इतनी देर कहाँ कर दी'?
'इतनी भीड़ में शिकार नहीं आयेगा' ...रुक कर फिर बोला, 'घर से निकलने में देर हो गयी थी'। आबिद ने जबाब सुनते ही कहा आज बिजली भी नहीं है शिकार को जरुर आना चाहिये। लैम्प और मोमबत्तियों की मंद-मंद रोशनी में आबिद ने उचक कर नमाज़ियो को वहाँ तक देखा जहाँ तक उसकी आँखे इसकी इज़ाज़त दे सकती। हाशिम मस्जिद की दूसरी दिशा में देखने लगा। आबिद ने पूछा 'दिखाई दिया' ? 'नहीं, मेरे ख्याल से वो अभी नहीं आया' हाशिम ने जवाब दिया।
बारहाल वक्त हो चुका सो अज़ान के बाद जमात खड़ी हो गयी उन दोनों को उनका शिकार न दिखाई पड़ा। दूसरी रकत का अभी सजदा ही हुआ था कि मस्जिद की पिछ्ली कतारों से माँ-बहन की गालियाँ देने की भारी बुलबुली आवाज़ ने इमाम साहब की आवाज़ को चुनौती दे दी। उसकी फाहशी गालियों को सुनकर कम उम्र के लडके खी-खी कर के बंदरों की तरह नियत बाँधे-बाँधे मस्जिद में हँसते रहे। ये एक नीम पागल था जिसका नाम बुलाकी था। पक्का रंग, छोटा कद समाने के दाँत गायब और चेहरे पर चीनी दाढ़ी जो ठुड्डी से आगे कभी बढ़ी ही न थी। साल में एक दो बार उसे उसके घर वाले पकड़ कर नहला देते। उसके कपडे किसी तप्पड से कम नहीं, बस एक कुर्ता नीचे तहमद जैसे इन्होने जिद कर ली हो कि मरते दम तक वे बुलाकी का साथ न छोडेगें। उसकी आवाज़ बहुत भारी थी, मुहँ में सामने के दाँतों का दरवाज़ा गायब होने से गले से निकले लफ्ज़, लफ्ज़ बनने से पहले ही हवा के गुब्बारे बनकर ब्रहमाण्ड में विलीन हो जाते। लिहाज़ा जब बुलाकी बोलता तो हो हो की आवाज़ अधिक होती लेकिन कयोंकि लोग अभ्यस्त हो चुके थे इसलिए वह उसकी बात समझ लेते थे। जिसे जब उचंग उठती वो बुलाकी को छेड़ लेता और उसका रेडियो स्टेशन एक ही रिकार्ड प्ले करता, वो बस माँ की गाली देता। दूसरे ही पल छेड़ने वाले को अगर बुलाकी से दोस्ती करनी हो तो एक बीड़ी पिलानी होती, बीड़ी देखते ही बुलाकी का गुस्सा गायब। उसके शैदाई मस्जिद में भी उसका पीछा न छोडते, मौका मिलते ही कोई ने कोई उसे छेड़ लेता और बुलाकी का रिकार्ड बिना परवाह किये बजने लगता।
सलाम फेरते ही मस्जिद का इन्तज़ामिया खड़ा होकर शरारत करने वालो को फटकार पिलाता, उन्हें अल्लाह के घर में अल्लाह से डराने की कोशिश करता। उसकी हाँ में हाँ चमड़े वाला बशीर सबसे पहले उठ कर मिलाता। बशीर से ही बुलाकी सबसे ज़्यादा डरता क्योंकि वह भी उसे सताने में माहिर था।
सुन्नत पढ़ते ही हाशिम और आबिद मस्जिद की पिछली सफ में आ गये। तब तक बुलाकी पहला झटका लगते ही इमाम साहब के बिल्कुल पीछे अपनी नमाज पढ़ने जा चुका था। अभी आधी तराबी भी पूरी न हुई थी कि हाशिम ने आबिद को खबर दी कि रहीम आढ़ती के नजमु ने बुलाकी के ऊँगली उस वक्त कर दी थी जब वह सजदे में था। तीन दिन पहले नजमु के भाई हसरत ने बुलाकी के सजदे में जाते ही अण्डे पकड़ लिये थे जिस पर बुलाकी ने कायदे का बवाल काटा था। आबिद और हाशिम को एक दिन और निराश होना पड़ा क्योंकि उनका शिकार हर बार उनसे बड़ा कोई और शिकारी शिकार कर लेता।

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रचनाकाल : दिसंबर 16,2012

फोटो सौजन्य : गूगल

Sunday, December 16, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ८- एक था समर


समर भाई अपने बाप के इकलौते बेटे थे, वालिद के फौत होने पर पिता का हिस्सा डायरेक्ट उनके खाते में आ गया था, कस्बे के बीचों बीच एक कतार में पांच दुकानें उसके ऊपर रहने के लिए कायदे का मकान, किराए की माकूल आमदनी, यानी बिगड़ने के लिए जितने बाहरी कारक जीवन को चाहिए थे वो सब उनके पास मौजूद। शाम होते ही उनका मुँह किसी तेज़ाबी गंध से महकता, फिर वे सीढियों से उतर कर सलीम पनवाड़ी से पान खाने पहुँच जाते। दिनभर ताश खेलना शाम को शराब,फिर देर रात तक कहीं चौकड़ी। नींद आ गयी तो सो गए और जब सो गए तो दोपहर तक कौन उठे ? समर भाई की नवाबी जिन्दगी का ज़रिया दुकानों से आने वाली किराय की आमदनी ही थी जिसे बढाने की फ़िराक़ में वो अक्सर लगे रहते, पगड़ी वसूल कर कभी नया किरायदार घुसा देना या फिर किराया बढ़ा कर। दुकानें चूंकि मुख्य बाज़ार में थी सो ग्राहकों की कमी न थी खूब चलाती, किरायेदार पैसा बनाता तो उसे किराया बढ़ने पर भी कोई ख़ास ऐतराज न होता।
समर के एक दूर के रिश्तेदार हाजी बकरा जिनका असली नाम असलम था,बकरे का गोश्त बेचने के कारण उनका समाजी नाम बकरा पड़ गया था, अपने लडके को कारोबार कराने के लिए एक दुकान की सख्त जरुरत थी लिहाजा वह पेशगी दस हजार रु समर को थमा गए और दुकान भी बता गए कि उन्हें कौन सी पसंद है। समर ने पैसा फ़ौरन संभाला और कहा की खाली कराने में जो खर्चा होगा वो तुम्हारा। हाजी बकरे ने खर्चे के नाम पर पहले सोचा फिर हाँ कर दी, एक शर्त के साथ कि ईद से पहले दुकान चाहिए। समर के पाले में गेंद फिर आ गयी .. सर खुजाते हुए बोला 'इतनी जल्दी ..ईद तो तीन महीने ही बाद है, हाजी जी खर्चा बहुत हो जायेगा, मैं ईद तक की जिम्मेदारी नहीं लेता, पर बकरा ईद तक की गारंटी, अगर ईद पर खाली हो गयी तो खर्चे के अलग दस हजार और लूँगा'।
हाजी बकरे को पसीना आ गया, माथा साफ़ करते हुए बोला 'खर्चा भी और दस अलग से, अरे अन्यायी जुलम मत कर तेरा भतीजा गुलफ़ाम काम करेगा, कुछ रहम कर दे'. समर ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, 'हाजी जी सल्लू का इनाम पच्चीस हजार नकद पगड़ी और 2000 रु महीना किराया लगा गया एक दूकान के, मैंने मना कर दिया, ये तो आप से रिश्तेदारी का मसला है कि मैंने हाँ कर दी वर्ना मुझे तो ईमान से नुकसान है इस सौद्दे में'. हाजी बकरे को इनाम के नाम पर झटका लगा , इनाम उनका मुखालिफ भी था सो फ़ौरन उनका मर्द जाग गया, 'अच्छा ये बात है, तेरा नुकसान नहीं चाहिए, मैं भी पूरे पच्चीस ही दूँगा'। बात तय हो गयी हाजी जब उठ कर जाने लगे समर ने कहा , 'हाजी जी 100 रु दे दो', हाजी बकरे ने 100 का नोट देते हुए पूछा 'ये किस मद में'? 'खर्चा आज से ही शुरू है, इंशाल्लाह ईद पर गुलफ़ाम का कारोबार शुरू हो जायेगा' समर ने खुलासा करते हुए हाजी बकरे को विदा किया।
कोई डेढ़ माह हो गया समर की परेशानी दिन बा दिन बढ़ती जा रही थी, वजह यह की हाजी बकरा को जो दुकान चाहिए थी उसमें एक लाला हरीश अपनी बिसाती की दुकान कई सालों से चलाते थे , दुकान खूब चलती समर ने लाला से कई बार बात की लेकिन लाला खाली करने के नाम पर बिदक जाये और सीधा कहे की किराया बढ़ा ले, दूकान नहीं खाली करूँगा। एक दो बार दोनों के बीच माँ- बहन की हो जाने के बाद आपसी बातचीत भी अब बंद हो गयी।
एक दिन लाला ने जब सुबह-सुबह अपनी दुकान खोली तो ताले पर मानव मल्ल के दर्शन हुए, ढूंढ़ ढांढ़ कर बड़ी मुश्किल में सफाई कर्मी हाथ लगा पांच रु देकर ताला धुलवाया फिर कही दुकान खुली। अगले दिन लाला ने दुकान खोली तब फिर वही नज़ारा देखने को मिला अब उसे समझ में आ गया कि माजरा क्या है? तीसरे दिन से लाला हरीश घर से ही पानी का लोटा साथ लेकर आने लगा। बेचारा पहले टट्टी धोये फिर दुकान खोले। अब मुसलामानो के मौहल्ले में वह सरेआम समर जैसे आदमी से न तो झगड़ा मोल लेना चाहे न दुश्मनी। घर से लोटा लाते देख उसने समर को जाहिर कर दिया कि इस तीर का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
दो दिन से एक अमरुद बेचने वाला लड़का अपनी ठेली लाला की दुकान के सामने अड़ा कर खडी करे जोर जोर से चिल्लाये 'ले जा ताजे दो रु किलो'. तीसरे दिन लाला के कान उसकी कर्कश आवाज़ से जब गूंजने लगे और उसके ग्राहक बिदकने लगे तब उसने पचास रु एक सिपाही को देकर चार डंडे ठेली वाले को लगवाये तब कहीं जाकर उसकी जान में जान आयी। लाला हरीश समर की दो गोली खा चुका था अब उसकी टेंशन बढ़ने लगी। हाजी बकरा भी एक दिन आकर उसे याद दिला गया कि हफ्ते बाद रमजान शुरू होने वाले हैं और अब तक खर्चे में ली हुई रकम के हिसाब की पर्ची भी उसे थमा गया जो तकरीबन 2600 रु की थी। समर भी हिम्मत हारने वाला नहीं था। उसने अपने बीवी बच्चों को कुछ दिन के लिए ससुराल भेज दिया और पूरे दिन हो हुल्लड़ करने के लिए तेज़ आवाज में म्यूजिक चलना शुरू कर दिया। लाला हरीश को हर रोज एक दो घूरते हुए खतरनाक चहरे दिखाई देते। हफ्ते भर चलती रही इस तरकीब का असर लाला हरीश के संकल्प को न डिगा सका, हां इस शोर शराबे से और गैर मामूली माहौल के चलते उसकी दुकानदारी अब प्रभावित होना शुरू हो चुकी थी। समर के दिमाग का पारा हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहा था। रमजान के दुसरे दिन उसने नया फार्मूला अपनाया। लाला की दुकान के ठीक ऊपर बने कमरे में भरी दोपहरी में उसने पानी भर दिया और हौज बना कर दारू पीकर उसमें लेट गया। मौहल्ले में शोर मच गया समर ने घर में हौज बना ली। लोग उसे देखने आयें, तफरीह करें और चले जाएँ। पुरानी इमारत पानी को ज्यादा बर्दाश्त कर पाने की स्थिती में नहीं थी, लिहाजा पानी रिस-रिस कर लाला की दुकान में टपकने लगा। दुकानदारी छोड़ लाला हरीश अपने माल को संभालने में लगा रहा। इतना बुरा हाल की दुकान के भीतर उसे छाता लेकर बैठने की नौबत आ गयी। उसने पुलिस भी बुलाई , समर ने कहा कि उसका मकान है, रमजान चल रहे है मुझे गर्मी लग रही है मैं अपने मकान के अन्दर हूँ किसी को क्या तकलीफ? रमज़ान की नज़ाकत देखते हुए पुलिस भी बेबस। उसी शाम को लाला हरीश ने ठेली मंगवा कर अपना सामान दुकान से हटा कर दुकान की ताली अपने पडौसी को देते हुए कहा, 'आदमी हो तो लड़ ले- लुच्चे से कौन लड़े भईय्या? ये ताली समर को भिजवा देना'
अगले दिन हाजी बकरे से पूरे बकाया पैसे लेते हुए समर ने एक कागज़ पर हाजी का अंगूठा लगवा लिया, दुकान की ताली साथ आये गुलफाम को देते हुए कहा,'ये एग्रीमेंट है एक साल का अगले साल फिर अंगूठा लगा देना, चलो काम धंधा शुरू करो। दुकान  का भाड़ा 2000 रु महीना है, महीने की दस तारीख याद रखना। लाला हरीश समर को हर महीने 1200 रु दिया करता था।
शाम को सलीम पनवाड़ी की दुकान पर समर को सल्लू का इनाम मिला , बोला 'चच्चा तुमने दुकान सस्ते में दे दी, मुझ से जिक्र करते तो मैं 2500 किराया देता और नगद पचास हजार पगड़ी, समर इनाम की कलाई पकड़ कर एक अँधेरे वाले कौने में ले गया और खड़े-खड़े बहुत देर तक बातें करता रहा।
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रचना काल= दिसंबर 16,2012
फोटो सौजन्य : गूगल



Tuesday, July 3, 2012

ज़िंदगी के आईने में घूमते किस्से - भाग ७- मेरे गुरुजन



                              (गुरुओं- आप किसी पूर्णिमा के मोहताज नहीं थे, न होंगे..!!!)

गुरु पूर्णिमा पर लोग अपने-अपने गुरुओं को याद करते हैं, मैं भी करता हूँ. कहना न होगा मेरे लगभग सारे गुरु "क्लास रुम" से बाहर वाले ही हैं. कक्षा में तो मात्र अध्यापक होता है जिसे पढाने के पैसे मिलते हैं, उनमें से एक आध कोई उत्प्रेरक का काम कर जाये तो वह गुरु वर्ना गुरु वह है जो आपको कुछ करने के लिये प्रेरित करे. उसका मात्र संसर्ग आपके जीवन में एक उत्प्रेरक बन जाये, उसके होने भर से आप किसी दिशा में खुद को बहता हुए देखे, जो भी यह कर सके, वही गुरु..मेरे लिये गुरु की यही परिभाषा है.
मैं जब छोटा था, हमारी दुकान थी साईकिलों की. स्कूल से लौटने के बाद अपना काम खत्म कर शाम होते-होते दुकान पर आना जरुरी था. दुकान और मकान में फ़ासला न था, दुकान के ऊपर मकान था. मकान-दुकान कस्बे की मुख्य सड़क के किनारे था जो खूब व्यस्त रहती थी. ठीक सामने जो गली थी उसमें उन दिनों देशी शराब का ठेका हुआ करता था. शहर के बीचो बीच आबादी वाले क्षेत्र में देशी शराब का ठेका. जिसके चलते स्वाभाविक रुप से उस गली का नाम "ठेके वाली गली" पड़ गया था. चूंकि कस्बे में ठेका एक ही था तो वह भी इकलौती गली थी, इसलिये पूरे कस्बें में अपने घर का पता बताने में कोई दिक्कत न थी, ठेके वाली गली के सामने. रोज़ शाम के वक्त उस गली में रौनक बढ़ने लगती. आसपास देहात के लोग दोपहर के बाद से ही आना शुरु हो जाते और जब वापस आते तो उनके कदमों की झूमती-बहकती गति से उनके पीने का अंदाज़ा लग जाता कि अध्धा पिया कि पव्वा..या बोतल.
रोज़ शाम को हमारी दुकान पर एक नौजवान बुलेट मोटर साईकिल पर आता. मेरे दादा या वालिद को वो अदब से सलाम-नमस्ते करता, उसकी चमचमाती काले रंग की मोटर साईकिल दुकान के एक निर्दिष्ट स्थान पर खड़ी होती और वह सीधा ठेके वाली गली में गुम हो जाता. उसके लौटने का मुझे इंतज़ार रहता. बहुत खूबसूरत, लंबा-तड़ंगा, सफ़ेद साफ़ कपडे पहनना उसका शौक, पास के गांव में एक जाट जमींदार के दो बेटों में वह बडा लडका था. उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी. बडा होने के कारण वह पढने लिखने के बावजूद कहीं नौकरी करने न जा सका था. जमींन जायदाद की रखवाली उसका पेशा बन गया था. उसका नाम अजीत सिंह था, वह ठेके वाली गली से जब लौटता तो अक्सर दो आदमियों के कंधों पर झूलता हुआ आता, लगभग बेहोश लेकिन बस अंग्रेज़ी में बडबड करता हुआ. मुझे नहीं पता कि वह क्या क्या बोलता थैंकयू, बाय बाय, गुड नाईट के अलावा वो देर देर तक अंग्रेज़ी में बोलता, जब तक उसकी मोटर साईकिल स्टार्ट करके उसके सहायक उसे बैठा न देते. उसी हालत में वह अपने गांव कोई १० किलोमीटर रात को खुद ड्राईव करके पहुँचता, घेर में उसके नौकर उसे गाडी से उतारते थे.
मुझे कदाचित उसका इंतज़ार रहता, क्योंकि मुझे उसे अंग्रेजी बोलते हुए देखने का चाव था, अजीत के चरित्र ने यकीनन मेरे बाल-ज़हन पर कोई बात रकम कर दी थी कि तुझे भी यह भाषा बोलनी है, तुझे भी यह भाषा जाननी है, लिहाजा अजीत सिंह, निवासी पिलौना तहसील मवाना जिला मेरठ मेरा पहला गुरु था. अजीत सिंह की कुछ समय के बाद मृत्यु हो गयी. मैं उसे आज नहीं, जब भी याद करता हूँ बहुत शिद्दत से करता हूँ. अपने थोडे बहुत अंग्रेज़ी के ज्ञान का श्रेय मैं अजीत सिंह को ही दूँगा न कि ठेके वाली गली में ही रहने वाले, कस्बे के सबसे अच्छे अंग्रेज़ी के अध्यापक, जो मेरे ही विद्यालय में अध्यापक थे. वह ट्यूशन भी पढाते, सुबह पांच बज़े से रात ९ बजे तक उनकी दुकान चलती. नौवीं में मैं उनसे ९ दिन और फ़िर ग्यारहवीं में ११ दिन उनसे ट्यूशन पढा, दोनों बार कोई न कोई हादिसा हुआ और उन्होंने मेरे से तौबा कर ली. पढाते समय गर्मियों में उनके बदन पर एक अदद पट्टे का कच्छा होता, उबले हुए नमक वाले आलू कटोरी भर-भर खाते रहते, गैस आती तो धडाम से बैठे-बैठे फ़ायरिंग करते, कोई हंस पडता तो उसे पीटते..बारहाल, निसंदेह वह अंग्रेज़ी के विद्वान थे लेकिन न जाने क्यूं हमारे पडौसी होते हुए भी वह मुझे प्रेरित न कर सके.
मैं जब थोडा और बडा हुआ तब मुझे पतंग उडाने का शौक हुआ, शौक भी ऐसा की जुनून की हद तक. जीवन में अभी तक एक बार ही किसी मोटर वाहन से टकराया हूँ वह भी पतंग की बदौलत. चांद तारा पतंग थी जिसे लूटने दौडा हुआ जा रहा था कि मुख्य सड़क पर कब पहुँच गया मालूम ही न हुआ. फ़ौज की जीप से टक्कर हुई, गिरा और बेहोश हो गया, आँख खुली तो खाला जान की गोद में था, पहली नज़र फ़िर आसमान पर गयी, शायद उसी चांद-तारा पतंग को देख रहा था कि कहां गयी..ये हादसा मेरी ननिहाल मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ था. उन दिनों बाय-पास नहीं बना था और वह सडक मुख्य राजमार्ग थी. खैर, हमारे कस्बे में एक व्यक्ति था जिसका नाम था खिब्बड, वह कस्बें का सबसे बडा पतंग बाज़ था. सब्ज़ी मण्डी की सरकारी दुकानों वाली छत पर वह अकेला पतंग उडाता, दो पतंग, दो चरखी लेकर एक सादी की और एक मांझे की. कोई एक डेढ़ घंटे के लिये वो पतंग उडाता और मौहल्ले भर की पतंगो का सफ़ाया करके वापस. उसकी पतंग देख कर लोग दूर से पहचान जाते कि ये खिब्बड की है, छोटे-मोटे बालक तो डर कर अपनी पतंग उतार लेते कि पहले खिब्बड अपना सफ़ाया अभियान पूरा कर ले..मैं उसे जब भी पतंग उडाते देखता तो बस मन में रहता कि पतंगबाज़ी हो तो खिब्बड जैसी, वर्ना न हो..मैंने उसकी पतंगों की चाईस, पेच लडाते हुये उसकी उंगलियों की हरकत, पतंग में ढसे डालने का तरीका आदि उसी को चुपचाप देखकर सीखा. कभी उसने बताया नहीं, कभी मैंने पूछा नहीं. उन दिनों कस्बें में पतंगबाजी की प्रतियोगिता भी होती और वह बाकायदा उसे जीतता था. फ़िर उसका विजय जुलूस कस्बे से होकर गुजरता, उसके गले में नोटों की मालायें होती. वह था खिब्बड जो केले का ठेला लगाता था, रात को दारु पीता, सिनेमा देखता, खूब ठठ्ठे मार कर हंसता तो उसके बेतरतीब मैले दांत, उसकी मैली कमीज़ मुझे यूं याद है जैसे कल की बात हो.
खिब्बड साहब को गुज़रे हुए भी एक ज़माना हुआ. मुझे फ़र्ख है कि मैं उसके नक्शे कदम पर चल कर एक कायदे का पतंगबाज़ बना, मुझे खिब्बड की पतंग काटने का भी ऐजाज़ हासिल है, लेकिन वो मेरा गुरु है, मैं बडे अकीदे से उसे सलाम अर्ज़ करता हूँ. एक और किरदार है, जिसका नाम बाड्डी है. वह खिब्बड का कम्पिटीटर था. उसकी शिफ़्त यह थी कि वो सडक पर खडे होकर ही पतंग उडाता था. उसका नाम लिये बगैर ये दास्तान अधूरी रहती, बाड्डी अभी है और मेरा दोस्त भी है, वह अब पतंग नहीं उडाता.
दर्जे ११-१२वीं तक आते आते मेरी पहचान कस्बें की कुछ काहियां निगाहों ने कर ली थी, यानि सियासी लोग ताड़ गये थे कि मुझ में कोई ऐसा कीड़ा है जो उनके ऐजेण्डे को लागू कर सके. ऐसे ही एक शख्स हैं कामरेड ज़हीर. यह वह शख्स है जिसने मेरी सोच के व्यक्तिगत होने के सपने को चकनाचूर किया. मेरे सवाल करने, नास्तिक प्रवृतियों को उन्होंने पहचाना और उसे सैद्धांतिक जामा पहनाने यानि मार्क्सवाद से अवगत कराने में उनका हाथ है. मरहूम कामरेड यूसुफ़  की चाय की दुकान उन दिनों कस्बे के सियासी लोगों का अड्डा हुआ करती थी. बस वही कामरेड ज़हीर से मुलाकात हुई और उन्होंने मुझे एस.एफ़.आई. के लोगों से संपर्क कराया. माकपा से अपने सियासी सफ़र के आग़ाज़ की कहानी उन्हीं ने शुरु करायी थी. जाहिर है ज़हीर भाई की इतिहास पर पकड़, ज़ुबान का साफ़ होना, तर्कों के जरिये भरी भीड को लाजवाब करने की कला को मैंने पहचाना था. उनके अध्ययन से मैं पहली बार मरूब हुआ, उनके किताबों के संकलन को देख कर पहली बार लगा कि मैंने कुछ पढा ही नहीं अभी तक. लिहाज़ा मेरे मानसिक, वैचारिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक विकास के पहले पाठ मुझे कामरेड ज़हीर से ही सीखने को मिले. सज्जाद ज़हीर, कुर्तुलएन हैदर, फ़ैज़, साहिर आदि साहित्यकारों-शायरों का नाम उन्हीं की अवैतनिक कक्षा में सुना था. उनके साथ स्थानीय राजनीतिक लोगों के साथ उठना बैठना शुरु हुआ तो मालूम हुआ कि हमारे कालिज के कई अध्यापक भाकपा से जुडे थे. हम उनके ही साथ बैठने लगे और सियासी तहरीकों में उनके साथ आना-जाना बहैसियत एक कामरेड के नाते ज़्यादा गहरा था बनिस्पत छात्र-अध्यापक जैसे रिश्ते के. कामरेड मास्टर नलुआ, शास्त्री जी, भाटी जी, कामरेड प्रीतम सिंह राठी आदि वो बुजुर्ग साथी थे जो अध्यापक भी थे और कम्युनिस्ट नेतागण भी. लिहाज़ा कामरेड ज़हीर के ज़रिये ही मेरे सियासी सफ़र और तर्क वादी चिंतन का आगाज़ हुआ, निसंदेह वह मेरे गुरु हैं और मैं पूरी ताबेदारी के साथ उन्हें आज याद करता हूँ.
पी.एच.डी. के छात्र होने तक के सफ़र में मुझे याद नहीं पडता कि मुझे मेरे किसी अध्यापक ने मुझे प्रभावित किया हो. मेरठ कालिज में डा. आर. एस. यादव (एम. एन. रायिस्ट, समाजशास्त्री) यकीनन वह शख्स थे जिनसे हम वैचारिक बहसें अथवा अपने मार्ग दर्शन के लिये उनके पास जाते थे, उनके अतिरिक्त मास्टर राजसिंह जैकरे, डा. असगर अली इंजीनियर, राम आसरे वर्मा, बुद्ध प्रिय मौर्य, कामरेड सुनीत चौपड़ा, कामरेड डा. जगपाल सिंह जे.एन.यू, कामरेड इश्वर चंद त्यागी (जो मुझे माले में लाये), कामरेड शिवकुमार मिश्र पिलखुवा वाले, कामरेड प्रभात कुमार राय, कामरेड अशोक कुमार शर्मा आदि वे व्यक्तित्व हैं जिनसे गाहे बगाहे जिंदगी में बहुत कुछ सीखने को मिला. कामरेड शिवकुमार मिश्र से अभावों के बीच खुद को बचाने की कला, कामरेड अशोक से भारत सरकार में उच्च पद पर रहते हुए भी एक नितांत इमानदार जीवन जीने और आम जनता के बारे में निष्ठापूर्वक काम करने, प्रभात भाई से परस्पर प्रेम और जीवंत संबंध बनाने के गुण निरंतर सीखने को मिले. मैं समझता हूँ इन व्यक्तित्वों के संसर्ग के बिना शायद मेरा जीवन न केवल मूल्यविहीन रहता बल्कि सूखा और नीरस भी होता. इन सभी का मुझ पर गुरुओं जैसा प्रभाव है, मैंने बहुत कुछ सीखा है और कोशिश करता हूँ कि इन्हीं की तरह और बेहतर इंसान बनूँ. मैं इस दिन इन सभी को मन की गहराईयों के साथ याद करता हूँ, उनका धन्यवाद करता हूँ, जो भी कमियां हैं वह मेरी निजी हैं लेकिन जो गुण है वो सब उन्हीं के हैं, इन सभी को तहे दिल से सलाम.
कुछ कसक भी हैं, जिन्हें मैं प्रभावित होने के बावजूद भी सीख न सका. एक हकीम थे, गन्ने की बुग्गियों पर बैठ कर आते थे ठेके की गली में घुसते और जब वापस लौटते थे तब बहुत सुरीली बांसुरी बजाते हुए निकला करते थे कि लोग खडे हो कर सुनने लगते. फ़िर कोई बुग्गी गांव की तरफ़ जाती दिखाई पडती उसी पर सवार होकर वापस..मैं उनकी बांसुरी को तब तक सुनता जब तक वो आंखों से ओझल न होते. ज़माना हुआ उन्हें भी फ़ौत हुए, उनकी बांसुरी भी चली गयी और साथ ही उनकी कहानी भी. मसूद भाई से उनके छापाखाना वाला काम, उनकी अम्मा से रुई की माफ़िक मुलायम पकौडियां बनाना, इशरत से उसकी हसौंड़ वाक पटुता, दुबई में तबरेज़ से उसकी विनम्रता, मुनीर भाई से उनका प्रोफ़ेशनल क्रिकेट, अपने बास मुल्ला से मखमली झूठ बोलने की कला न सीख पाया, कुछ जानबूझ कर, कुछ मज़बूरी में और कुछ माफ़िक हालातों के तहत. सीखना अभी जारी है, आठ दस साल के बाद यहीं से अगली कडी फ़िर लिखूंगा, जिसमें उनका हवाला भी दूंगा जो अब तक के सफ़र में रह गये या जिसने आज के बाद सीखूंगा.
रचनाकाल: जौलाई ३,२०१२

फ़ोटो: कामरेड ज़हीर कुरैशी मवाना

Wednesday, June 27, 2012

जिंदगी के आईने में घूमते किस्से- भाग ६ - मुशायरा उजाड़ महबूब





कस्बे की सबसे बडी और प्रसिद्ध धर्मशाला में अक्सर शादी ब्याह के अतिरिक्त सामाजिक काम भी होते, बस अड्डे के सामने होने के कारण उसका रणनीतिक महत्व भी था. कवि सम्मेलनों, मुशायरों के लिये इसका उपयोग खूब होता क्योंकि बाहर से आने वालों को आयोजन स्थल के लिये दूर चलना ही नहीं होता था, बस से उतरो और ठीक सड़क पार धर्मशाला.

सर्दियों की सुस्ताई हुई सी उस शाम को मास्टर सलीम की सदारत में मुशायरे का अयोजन किया जा रहा था, जिले भर से कई नामी गिरामी शायर बुलाये गये थे. कस्बे में मुनादी के साथ-साथ पर्चे भी बंटवा दिये गये थे ताकि अदब में रुचि रखने वाले लोग मुशायरे में पहुँचे और शायरों के कलाम से लुत्फ़ उठायें. धर्मशाला के आँगन में दरियाँ बिछा दी गयी थी. उसके आँगन को ऊपर से पंडाल लगा कर ढक दिया गया था ताकि ठंडी हवा दाखिल हो. रोशनी के लिये जो हण्डे मंगवाये गये थे उनसे माहौल में गर्मी भी पैदा हो गयी थी. १५०-२०० श्रोताओं से धर्मशाला का आँगन खचाखच भर गया था. सामने बीचों बीच मंच बनाया गया था जिसपर १५-२० कदीमी और बाहर से आये शायर हज़रात गोल-गोल, मोटे-मोटे तकियों पर कमर लगाये आधे बैठे, आधे लेटे अपने-अपने नंबर का इंतज़ार कर रहे थे. सभी की सहूलियत के लिये उगालदान मंच पर ही मौजूद थे ताकि पान खाने वालों को कोई दिक्कत पेश आये.

मुशायरे का पहला घंटा कदीमी नौजवान शायरों के आने-जाने में निकल चुका था. अब महफ़िल परवान चढ़ने लगी थी कि महबूब का हाथ पकडे - लडकों का एक समुह दाखिल हुआ किसी का लोई तो किसी ने खेस तो किसी ने मफ़लर से मुँह ढ़का हुआ था. अब सर्दी है तो किसी को कोई एतराज़ भी नहीं.

बारहाल आँगन में बैठने की जगह तो थी ही नहीं, मंच की बगल में जो बरामदा था वहीं कतार बद्ध थमों के इर्द-गिर्द ये चौकडी खडी हो गयी. बाहर के एक दो शायर अपना कलाम पढ़ चुके थे, वाह वाही के दौर से महफ़िल के जोश को समझा जा सकता था कि सदर मोहरत ने जिले के सबसे बडे शायर को दावत दी, खाँस खूँस कर गला साफ़ करते, उगालदान में थूक-थाक कर शायर महोदय ने अपना कलाम सुनाना शुरु किया. उन्हें सुनने के लिये पूरी महफ़िल दम साधे इंतज़ार जो कर रही थी. स्टार शायर ने मत्ला अर्ज़ किया, एक दो वाह वाह ने सन्नाटे को चीरा, नवाब ने महबूब के हाथ को दबाया और फ़ौरन एक रिहा खारिज़ करने की भयानक आवाज़ पैदा हुई, इस बेसुरे हादसे पर किसी की खास तवज्जो हुई, शायर ने दूसरी लाईन पढ़कर शेर मुकम्मिल किया और महफ़िल की वाह-वाही लूटी.

शायर ने दूसरे शेर की पहली पंक्ति पढी, पहली और दूसरी पंक्ति पढने के अंतराल में एक दो वाह वाह के साथ महबूब की कलाई फ़िर दबी, इस बार पहले से भी अधिक भयानक आवाज़ थी. जिसे सुनकर श्रोताओं में से एक दो की हंसी छुट गयी, आँगन में बैठे लोगों की गरदनें आवाज़ वाली दिशा में मुड़ी और किसी बेज़ौक अपराधी को तलाशने लगी, शायर ने इस बार नोटिस लिया, जिस दिशा से आवाज़ आयी उधर इशारा करके कहा, "भाई अगर पेट खराब है तो बाहर चले जायें"..खैर उधर चेहरे ढके हुए थे, सदर की तरफ़ से आवाज आयी, इरशाद...शायर ने अपना शेर पूरा किया और जब दाद मिली तो स्टार शायर की साँस में साँस आयी.

अब तीसरे शेर का महफ़िल को बडी शिद्दत से इंतज़ार था. शायर ने अपने शेर की पहली पंक्ति पूरी की, कि बहुत सी निगाहें खुद खुद बारामदे की तरफ़ मुड़ गयी. अबकि बार महबूब की कलायी दबी भी नहीं, उसकी तरफ़ देखने वाली निगाहों का इसरार हुआ और फ़िर एक धमाकेदार आवाज़ आयी. अब शायर का सब्र टूट गया था. महफ़िल के सद्र मास्टर सलीम से मुख़ातिब होकर उन्होंने लानतें भेजना शुरु की और फ़िर गालियाँ बकनी शुरु कर दी. एक दो शायर भी खडे हो गये, बंद करो मुशायरा, इस बेगैरत माहौल में मुशायरे होते हैं? मास्टर सलीम शायरों की ढुड्डियों में हाथ डालने लगे. इसी बीच धक्का मुक्की में एक उगाल दान मंच से लुढ़का, उसकी पीक छ्लक कर नीचे बैठे किसी श्रोता के कपडों पर पडी जिसे देख कर किसी ने कहा खून..

बस फ़िर क्या, पूरी महफ़िल में जैसे भगदड़ मच गयी हो, सभी उठ-उठ कर भागने लगे..बाहर से आये शायरों ने आयोजकों को पकड़-पकड़ कर अपने पैसे मांगने शुरु किये, मास्टर सलीम की सफ़ेद जवाहर कट का हश्र थोडी ही देर में किसी पल्लेदार की जाकेट सा हो गया.

बाहर निकलती हुई भीड़ में वे चार-पाँच लडके महबूब के साथ जोर-जोर से हँसे जा रहे थे. जावेद, असलम, मुन्नव्वर फ़िल्म देखने जा रहे थे कि उन्हें महबूब दिखाई दे गया. शकील ने मश्विरा दिया क्यों कस्बें में हो रहे मुशायरे में चला जाये. बस फ़िर क्या जावेद और महबूब की रास्ते में चलते चलते क्या सैटिंग हुई कि जावेद ने महबूब का हाथ थामे रखा.

इस घटना के बाद कई वर्षों तक कस्बें में कोई मुशायरा हुआ. मास्टर सलीम की सप्ताहिक नशिस्तें जो उनकी बैठक में बिला नागा हुआ करती थी, वह पहले दरवाजों के पीछे होने लगी. जब वहां संभव हो सकी तो स्थान बदली किया गया, जाने कैसे जावेद और उसकी मण्डली को खबर मिल जाती और वे बस अंदर आने की इज़ाज़त माँगते जो उन्हें मिलती और नशिस्त भी आगे चलती...

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रचनाकाल जून २७,२०१२

छाया चित्र सौजन्य: गूगल